अंतर्राष्ट्रीय सहकारिता दिवस प्रतिवर्ष जुलाई के पहले शनिवार को मनाया जाता है। 2026 में यह दिवस 4 जुलाई को है। इसका उद्देश्य सहकारी समितियों द्वारा आर्थिक और सामाजिक विकास में दिए गए योगदान को उजागर करना है। अंतर्राष्ट्रीय सहकारिता दिवस सहकारी आंदोलन का एक वार्षिक उत्सव है, जिसे अंतर्राष्ट्रीय सहकारी गठबंधन द्वारा 1923 से जुलाई के पहले शनिवार को मनाया जाता है। 16 दिसंबर 1992 को, संयुक्त राष्ट्र महासभा ने संकल्प 47/90 में “जुलाई 1995 के पहले शनिवार को अंतर्राष्ट्रीय सहकारी दिवस के रूप में घोषित किया,।जो अंतर्राष्ट्रीय सहकारी गठबंधन की स्थापना की शताब्दी को चिह्नित करता है।” 1995 से संयुक्त राष्ट्र का अंतर्राष्ट्रीय सहकारी दिवस अंतर्राष्ट्रीय सहकारी दिवस के साथ संयुक्त रूप से मनाया जाता है।दुनिया भर में सहकारी समितियाँ इस दिन को विभिन्न तरीकों से मनाती हैं और हर साल आयोजन संस्थाएँ समारोहों के लिए एक विषय पर सहमत होती हैं। सहकारिता के बारे में विस्तृत रूप से जानने के लिए हमारे साथ अंत तक बन रहें।
मानव सभ्यता के विकास का इतिहास इस बात का प्रमाण है कि जब लोग किसी साझा उद्देश्य के लिए एकजुट होकर कार्य करते हैं, तब सीमित संसाधनों के बावजूद बड़े परिवर्तन संभव हो जाते हैं। यही विचार “सहकारिता” का मूल है। सहकारिता केवल आर्थिक व्यवस्था नहीं, बल्कि सामाजिक विश्वास, लोकतांत्रिक भागीदारी, समानता, पारदर्शिता और सामूहिक उत्तरदायित्व का जीवन-दर्शन है। आज जब विश्व आर्थिक असमानता, बेरोज़गारी, जलवायु परिवर्तन और सामाजिक विषमता जैसी चुनौतियों का सामना कर रहा है, तब सहकारी संस्थाएँ टिकाऊ और समावेशी विकास का प्रभावी माध्यम बनकर उभरी हैं। इसी विचार को वैश्विक स्तर पर सम्मान देने के लिए प्रत्येक वर्ष जुलाई के प्रथम शनिवार को अंतरराष्ट्रीय सहकारिता दिवस (International Day of Cooperatives) मनाया जाता है। वर्ष 2026 में यह दिवस 4 जुलाई को मनाया जा रहा है। यह अवसर केवल सहकारी संस्थाओं की उपलब्धियों का उत्सव नहीं, बल्कि यह संदेश भी देता है कि सामूहिक प्रयासों से ही आत्मनिर्भर, न्यायपूर्ण और समृद्ध समाज का निर्माण संभव है।
अंतरराष्ट्रीय सहकारिता दिवस का इतिहास
अंतरराष्ट्रीय सहकारिता दिवस का इतिहास एक शताब्दी से भी अधिक पुराना है। वर्ष 1923 में International Cooperative Alliance ने पहली बार इस दिवस को मनाने की शुरुआत की। इसका उद्देश्य विश्वभर की सहकारी संस्थाओं के योगदान को सम्मान देना तथा सहकारिता के सिद्धांतों का प्रचार-प्रसार करना था। बाद में United Nations ने सहकारिता की वैश्विक उपयोगिता को स्वीकार करते हुए वर्ष 1995 में इस दिवस को आधिकारिक मान्यता प्रदान की। तब से संयुक्त राष्ट्र और आईसीए संयुक्त रूप से प्रत्येक वर्ष इस दिवस का आयोजन करते हैं तथा एक केंद्रीय विषय (Theme) निर्धारित करते हैं, जिसके माध्यम से वैश्विक विकास में सहकारिता की भूमिका को रेखांकित किया जाता है।
आज विश्व के लगभग सभी देशों में लाखों सहकारी संस्थाएँ कृषि, डेयरी, बैंकिंग, आवास, शिक्षा, स्वास्थ्य, ऊर्जा, उपभोक्ता सेवाओं और लघु उद्योगों के क्षेत्र में कार्य कर रही हैं।
इस वर्ष 2026 का उद्देश्य और संदेश
वर्ष 2026 का मूल संदेश यह है कि सहकारिता केवल व्यापार का माध्यम नहीं, बल्कि लोगों को समान अवसर, आर्थिक सुरक्षा, सामाजिक न्याय और लोकतांत्रिक भागीदारी प्रदान करने वाला मॉडल है। यह मॉडल लाभ कमाने से पहले व्यक्ति और समाज के हित को प्राथमिकता देता है।
सहकारिता क्या है?
सहकारिता ऐसे व्यक्तियों का स्वैच्छिक संगठन है जो अपनी साझा आर्थिक, सामाजिक अथवा सांस्कृतिक आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए लोकतांत्रिक तरीके से संचालित संस्था का गठन करते हैं। प्रत्येक सदस्य का समान अधिकार होता है और निर्णय सामूहिक रूप से लिए जाते हैं। सहकारिता का मूल मंत्र है: —“एक सबके लिए और सब एक के लिए।”
सहकारिता के सात मूल सिद्धांत
विश्वभर की सहकारी संस्थाएँ सात सार्वभौमिक सिद्धांतों पर आधारित हैं :—
1) स्वैच्छिक एवं खुली सदस्यता
2) लोकतांत्रिक नियंत्रण
3) सदस्यों की आर्थिक भागीदारी
4) स्वायत्तता एवं स्वतंत्रता
5) शिक्षा, प्रशिक्षण एवं सूचना
6) सहकारी संस्थाओं के बीच सहयोग
7) समुदाय के सतत विकास के प्रति प्रतिबद्धता
यही सिद्धांत सहकारी आंदोलन को अन्य व्यावसायिक संस्थाओं से अलग पहचान प्रदान करते हैं।
समाज में सहकारिता की उपयोगिता
सहकारिता का सबसे बड़ा लाभ यह है कि यह समाज के अंतिम व्यक्ति तक विकास का लाभ पहुँचाने का प्रयास करती है। छोटे किसान, मजदूर, महिलाएँ, कारीगर, मछुआरे, बुनकर, स्वरोज़गार से जुड़े लोग तथा निम्न आय वर्ग के नागरिक सहकारी संस्थाओं के माध्यम से संगठित होकर अपनी आर्थिक स्थिति मजबूत कर सकते हैं। सहकारी संस्थाएँ सामाजिक विश्वास बढ़ाती हैं, लोगों में नेतृत्व क्षमता विकसित करती हैं, सामुदायिक सहभागिता को प्रोत्साहित करती हैं तथा आर्थिक संसाधनों का न्यायपूर्ण वितरण सुनिश्चित करने का प्रयास करती हैं।
आर्थिक दृष्टि से सहकारिता का प्रभाव
आर्थिक दृष्टि से सहकारिता अत्यंत प्रभावी व्यवस्था है। यह छोटे उत्पादकों को बाज़ार उपलब्ध कराती है, किसानों को उचित मूल्य दिलाती है, ग्रामीण क्षेत्रों में रोजगार बढ़ाती है तथा बिचौलियों की भूमिका कम करती है। कृषि, डेयरी, मत्स्य पालन, बैंकिंग, उर्वरक, चीनी उद्योग, हस्तशिल्प और ग्रामीण उद्योगों में सहकारी मॉडल ने लाखों लोगों की आय में वृद्धि की है। सहकारी बैंक एवं कृषि ऋण समितियाँ किसानों को सुलभ ऋण उपलब्ध कराती हैं, जिससे ग्रामीण अर्थव्यवस्था मजबूत होती है।
सहकारिता का सामाजिक प्रभाव
सहकारिता सामाजिक समरसता का माध्यम है। इसमें जाति, धर्म, भाषा और वर्ग से ऊपर उठकर सामूहिक हित को महत्व दिया जाता है। इससे सामाजिक समानता, पारस्परिक विश्वास और सहयोग की भावना विकसित होती है।
महिला स्वयं सहायता समूहों तथा महिला सहकारी समितियों ने महिलाओं को आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर बनाने में उल्लेखनीय योगदान दिया है। शिक्षा, स्वास्थ्य और स्वच्छता जैसे क्षेत्रों में भी सहकारी संस्थाओं ने महत्वपूर्ण कार्य किए हैं। राजनीतिक एवं लोकतांत्रिक प्रभाव
सहकारिता लोकतंत्र की व्यवहारिक पाठशाला मानी जाती है। इसमें प्रत्येक सदस्य को समान मताधिकार प्राप्त होता है। निर्णय बहुमत से लिए जाते हैं तथा नेतृत्व का चयन लोकतांत्रिक प्रक्रिया से होता है। इससे नागरिकों में उत्तरदायित्व, पारदर्शिता, भागीदारी और नेतृत्व की भावना विकसित होती है। स्थानीय स्तर पर लोकतांत्रिक संस्कृति को मजबूत करने में सहकारी संस्थाओं की महत्वपूर्ण भूमिका रही है।
भारत में सहकारिता आंदोलन
भारत में सहकारिता आंदोलन की औपचारिक शुरुआत 1904 में Co-operative Credit Societies Act से हुई। इसका उद्देश्य किसानों को साहूकारों के शोषण से बचाना और उन्हें सस्ता ऋण उपलब्ध कराना था। इसके बाद 1912 का सहकारी समितियाँ अधिनियम लागू हुआ, जिसने विभिन्न प्रकार की सहकारी समितियों के गठन का मार्ग प्रशस्त किया। स्वतंत्रता के बाद पंचवर्षीय योजनाओं में सहकारिता को ग्रामीण विकास का प्रमुख आधार बनाया गया। आज भारत विश्व के सबसे बड़े सहकारी नेटवर्क वाले देशों में शामिल है।
भारत में सहकारिता का कानूनी ढाँचा
भारत में सहकारी समितियों का संचालन विभिन्न राज्य सहकारी अधिनियमों, बहुराज्यीय सहकारी समिति अधिनियम तथा संविधान के 97वें संशोधन के प्रावधानों के अंतर्गत किया जाता है। इस संशोधन ने सहकारी समितियों को लोकतांत्रिक एवं स्वायत्त संस्थाओं के रूप में अधिक संवैधानिक संरक्षण प्रदान किया। वर्ष 2021 में भारत सरकार ने Ministry of Cooperation की स्थापना कर सहकारी आंदोलन को नई गति देने का प्रयास किया। इसका उद्देश्य “सहकार से समृद्धि” के लक्ष्य को साकार करना है।
भारत की प्रमुख सहकारी संस्थाएँ
भारत में अनेक सहकारी संस्थाओं ने राष्ट्रीय ही नहीं बल्कि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी विशिष्ट पहचान बनाई है।
* AMUL ने भारत में श्वेत क्रांति को नई दिशा दी। इस मॉडल ने लाखों दुग्ध उत्पादक किसानों की आय बढ़ाई और भारत को विश्व के प्रमुख दुग्ध उत्पादक देशों में स्थापित किया।
* Indian Farmers Fertiliser Cooperative Limited विश्व की सबसे बड़ी उर्वरक सहकारी संस्थाओं में गिनी जाती है। इसने किसानों को गुणवत्तापूर्ण उर्वरक उपलब्ध कराने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है।
* Krishak Bharati Cooperative Limited उर्वरक उत्पादन और कृषि सेवाओं के क्षेत्र में किसानों की महत्वपूर्ण सहयोगी संस्था है।
* National Cooperative Development Corporation देशभर में सहकारी परियोजनाओं को वित्तीय सहायता प्रदान करती है।
* National Cooperative Union of India सहकारी शिक्षा, प्रशिक्षण एवं जागरूकता के क्षेत्र में अग्रणी भूमिका निभाती है।
इसी प्रकार सहकारी बैंक, प्राथमिक कृषि साख समितियाँ (PACS), चीनी मिलें, डेयरी समितियाँ तथा महिला सहकारी समितियाँ देश की ग्रामीण अर्थव्यवस्था की महत्वपूर्ण आधारशिला हैं।
ग्रामीण विकास में सहकारिता कि भूमिका
भारत की अधिकांश आबादी ग्रामीण क्षेत्रों में निवास करती है। ऐसे में सहकारी संस्थाएँ किसानों को बीज, उर्वरक, ऋण, विपणन, भंडारण तथा आधुनिक तकनीक उपलब्ध कराने का कार्य करती हैं।आज कई राज्यों में प्राथमिक कृषि साख समितियों को बहुउद्देशीय ग्रामीण सेवा केंद्रों के रूप में विकसित किया जा रहा है, जिससे किसानों को एक ही स्थान पर अनेक सुविधाएँ मिल सकें।
महिला सशक्तिकरण और सहकारी समितियां
महिला सहकारी समितियों ने लाखों महिलाओं को स्वरोजगार, बचत, सूक्ष्म वित्त, डेयरी, हस्तशिल्प और खाद्य प्रसंस्करण से जोड़कर आर्थिक आत्मनिर्भरता प्रदान की है। इससे महिलाओं का सामाजिक सम्मान और निर्णय क्षमता भी बढ़ी है।
आत्मनिर्भर भारत में सहकारिता कि भूमिका
आत्मनिर्भर भारत के लक्ष्य को प्राप्त करने में सहकारी संस्थाओं की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण है। स्थानीय उत्पादन, स्थानीय रोजगार, ग्रामीण उद्यमिता, कृषि मूल्य संवर्धन और सामुदायिक भागीदारी के माध्यम से सहकारिता आत्मनिर्भर अर्थव्यवस्था की मजबूत नींव तैयार करती है।
सहकारी आंदोलन और वर्तमान चुनौतियाँ
यद्यपि सहकारी आंदोलन ने उल्लेखनीय सफलता प्राप्त की है, फिर भी कई चुनौतियाँ मौजूद हैं। कुछ संस्थाओं में पारदर्शिता की कमी, राजनीतिक हस्तक्षेप, वित्तीय अनुशासन का अभाव, आधुनिक तकनीक का सीमित उपयोग, युवा पीढ़ी की कम भागीदारी तथा पेशेवर प्रबंधन की आवश्यकता आज भी महसूस की जाती है। इन चुनौतियों का समाधान डिजिटल प्रबंधन, नियमित प्रशिक्षण, पारदर्शी चुनाव, बेहतर लेखा प्रणाली और सदस्य जागरूकता से किया जा सकता है।
भविष्य की दिशा
आने वाले समय में डिजिटल सहकारिता, ई-मार्केटिंग, कृत्रिम बुद्धिमत्ता आधारित कृषि सेवाएँ, जैविक खेती, हरित ऊर्जा, जल संरक्षण तथा महिला एवं युवा नेतृत्व सहकारी आंदोलन को नई ऊँचाइयों तक ले जा सकते हैं। यदि सहकारी संस्थाएँ आधुनिक तकनीक और पारदर्शी प्रशासन को अपनाती हैं, तो वे सतत विकास लक्ष्यों की प्राप्ति में और अधिक प्रभावी योगदान देंगी।
अंतरराष्ट्रीय सहकारिता दिवस केवल एक वार्षिक आयोजन नहीं, बल्कि यह विश्वास का उत्सव है कि सामूहिक प्रयास व्यक्तिगत संघर्षों से अधिक शक्तिशाली होते हैं। सहकारिता ने विश्वभर में करोड़ों लोगों को सम्मानजनक आजीविका, सामाजिक सुरक्षा और आर्थिक आत्मनिर्भरता प्रदान की है। भारत जैसे विशाल और विविधतापूर्ण देश में इसकी प्रासंगिकता और भी अधिक है, क्योंकि यह किसानों, श्रमिकों, महिलाओं, युवाओं और छोटे उद्यमियों को विकास की मुख्यधारा से जोड़ती है। आज आवश्यकता इस बात की है कि सहकारिता को केवल सरकारी योजना नहीं, बल्कि जनआंदोलन के रूप में देखा जाए। पारदर्शिता, लोकतांत्रिक मूल्यों, आधुनिक तकनीक और जनभागीदारी के साथ यदि सहकारी आंदोलन को आगे बढ़ाया जाए, तो यह न केवल ग्रामीण भारत बल्कि पूरे राष्ट्र की आर्थिक प्रगति, सामाजिक समानता और सतत विकास का सबसे सशक्त आधार बन सकता है। वास्तव में, “सहकार से समृद्धि” केवल एक नारा नहीं, बल्कि समावेशी, आत्मनिर्भर और विकसित भारत की दिशा में एक सशक्त राष्ट्रीय संकल्प है।




