वरिष्ठ नागरिक दिवस पर एक सवाल, जो शायद हमें अपने भीतर झांकने के लिए मजबूर करे!
कभी किसी घर में एक बच्चा पैदा होता है तो पूरा घर बदल जाता है। उसके रोने पर सबकी नींद टूटती है, उसके हंसने पर पूरा घर मुस्कुराता है। पहली बार वह पलटता है, पहला कदम उठाता है, पहला शब्द बोलता है और जब लड़खड़ाती आवाज में पहली बार “मां” या “पापा” कहता है, तो माता-पिता को लगता है जैसे उन्होंने दुनिया की सबसे बड़ी खुशी पा ली हो। वह बच्चा धीरे-धीरे बड़ा होता है। मां उसके लिए अपनी नींद, अपनी इच्छाएं और अपनी सुविधाएं छोड़ती जाती है। पिता अपनी जरूरतों को पीछे रखकर उसके भविष्य के लिए कमाता है। बच्चे की फीस, कपड़े, किताबें, बीमारी, शौक और सपने, धीरे-धीरे माता-पिता के अपने जीवन का केंद्र बन जाते हैं। वे बच्चे में केवल उसका वर्तमान नहीं, “अपना भविष्य भी देखने लगते हैं, लेकिन फिर समय बदलता है“ वही बच्चा बड़ा होकर नौकरी करने लगता है। उसका अपना परिवार बनता है। उसकी अपनी व्यस्तताएं, अपनी प्राथमिकताएं और अपना संसार बन जाता है। और कभी-कभी एक दिन वह सवाल सामने आ जाता है, “मां-पापा को अपने साथ रखें या नहीं?” यहीं से इस पूरे विषय का सबसे कठिन सवाल शुरू होता है। जिस बच्चे के लिए माता-पिता का पूरा जीवन समर्पित था, आखिर उसके बड़े हो जाने पर माता-पिता उसके जीवन में एक विकल्प क्यों बन गए?
वरिष्ठ नागरिक दिवस आखिर क्यों?
21 अगस्त को राष्ट्रीय वरिष्ठ नागरिक दिवस National Senior Citizens Day के रूप में मनाने की परंपरा अमेरिका में 1988 में शुरू हुई। उस समय भी इसके पीछे मूल भावना वरिष्ठ नागरिकों के योगदान, सम्मान और गरिमापूर्ण जीवन की ओर ध्यान आकर्षित करना थी। भारत में वरिष्ठ नागरिकों से संबंधित विमर्श का अपना व्यापक सामाजिक और कानूनी संदर्भ है। संयुक्त राष्ट्र का International Day of Older Persons हर वर्ष 1 अक्टूबर को मनाया जाता है। लेकिन किसी भी दिवस का असली अर्थ तारीख जान लेना नहीं है।
सवाल यह है कि हमें बुजुर्गों के सम्मान के लिए एक दिवस की जरूरत क्यों पड़ रही है? क्या सम्मान केवल एक दिन की शुभकामना है? या यह दिन हमें याद दिलाता है कि जिस पीढ़ी ने हमारे लिए अपना जीवन लगाया, उसे जीवन के अंतिम पड़ाव पर सम्मान, सुरक्षा, अपनापन और गरिमा मिलना सुनिश्चित करना भी हमारी जिम्मेदारी है?
वह मां याद है, जिसके लिए बच्चे का रोना सबसे बड़ी चिंता था?
एक मां नौ महीने तक अपने भीतर एक जीवन को पालती है। प्रसव की पीड़ा के बाद जब वह पहली बार अपने बच्चे को देखती है तो उसकी आंखों में दर्द से ज्यादा उस नन्ही-सी जिंदगी को पाने की खुशी होती है। वह बच्चे को अपनी बाहों में लेती है और मानो उसके लिए अपना पूरा संसार समर्पित कर देती है।
बच्चा रात में रोता है तो मां जागती है।
उसे बुखार होता है तो मां बेचैन होती है।
वह स्कूल जाता है तो मां दरवाजे तक छोड़ने आती है।
वह गिरता है तो मां दौड़कर उठाती है।
वह पहली बार बोलता है तो मां खुशी से सबको बताती है।
और जब वही बच्चा पहली बार “मां” कहता है, तो शायद उस एक शब्द में उसकी वर्षों की थकान कहीं खो जाती है।मां बच्चे को बड़ा करते हुए कभी यह हिसाब नहीं लगाती कि उसने उसके लिए कितनी रातें जागीं। फिर बुढ़ापे में उस मां के लिए अपने ही बच्चे के घर में जगह और समय का हिसाब क्यों शुरू हो जाता है?
वह पिता याद है, जिसने बच्चे में अपना भविष्य देखा था?
एक पिता जब अपने बच्चे को पहली बार गोद में उठाता है तो वह केवल एक नवजात को नहीं देखता।
वह उसमें अपना सपना देखता है।
वह सोचता है :—
मेरा बच्चा मुझसे आगे जाएगा।
मेरे अधूरे सपने शायद यह पूरा करेगा।
मैं इसे वह दूंगा जो मुझे नहीं मिल पाया।
वह अपनी जरूरतें टालता है।
कपड़े पुराने चल जाते हैं, लेकिन बच्चे की फीस नहीं रुकती।
अपनी इच्छा बाद में पूरी कर लेंगे, लेकिन बच्चे की किताब अभी खरीदनी है।
अपने लिए आराम कम कर लेंगे, लेकिन बच्चे का भविष्य सुरक्षित होना चाहिए।
अपना सब कुछ दांव पर लगाकर वह उसे उसे मुकाम तक पहुंचा देता है जहां तक उसकी पहुंच है। वह उम्रभर यह सोचता रहता है कि “मेरे बच्चे का जीवन मुझसे बेहतर होना चाहिए।”
और फिर :—
एक उम्र आती है जब वही पिता धीमे चलने लगता है।
उसे सीढ़ियां चढ़ने में सहारे की जरूरत पड़ती है।
उसे दवाइयों की जरूरत होती है।
उसे शायद पहले जैसी तेज आवाज में सुनाई नहीं देता।
और कभी-कभी उसे अपने ही बच्चे से मिलने के लिए समय मांगना पड़ता है।
क्या सचमुच पिता की जरूरतें इतनी बदल गईं कि जिस बच्चे का भविष्य उसके लिए जीवन का सबसे बड़ा सपना था, उसके वर्तमान में पिता के लिए जगह ही नहीं बची?
फिर आखिर बदला क्या?
यह कहना आसान होगा कि आज की युवा पीढ़ी स्वार्थी हो गई है।
लेकिन क्या पूरी सच्चाई इतनी सरल है?
पिछले कुछ दशकों में हमारा जीवन बहुत बदल गया। संयुक्त परिवारों की जगह एकल परिवार बढ़े। रोजगार के लिए शहर बदलना सामान्य हुआ। पति-पत्नी दोनों के काम करने की परिस्थितियां बढ़ीं। घर छोटे हुए। निजी स्वतंत्रता और व्यक्तिगत निर्णयों का महत्व बढ़ा।
यह सब परिवर्तन अपने आप में गलत नहीं हैं।
लेकिन इनके बीच कहीं एक और बदलाव आया।
“हम” की जगह “मैं” कितना बड़ा हो गया?
क्या आधुनिक होने की दौड़ में हमने परिवार को सुविधा के हिसाब से व्यवस्थित करना शुरू कर दिया?
क्या हमारी जिंदगी में रिश्ते भी अब उतनी ही जगह लेते हैं, जितनी हमारे पास सुविधा से उपलब्ध है?
और सबसे कठिन सवाल :—
क्या हमारे पास सचमुच जगह कम हुई है, या हमारे मन में जगह कम हुई है?
क्या हर बुजुर्ग को बच्चों के साथ ही रहना चाहिए?
इस सवाल का उत्तर भी ईमानदारी से देना होगा। हर स्थिति में नहीं।
हर परिवार की परिस्थितियां अलग होती हैं।
किसी बेटे या बेटी को नौकरी के कारण दूसरे शहर या देश में रहना पड़ सकता है। किसी परिवार का घर छोटा हो सकता है। कभी स्वास्थ्य संबंधी परिस्थितियां अलग रहने की मांग कर सकती हैं। कभी पति-पत्नी और माता-पिता के बीच गंभीर मतभेद भी हो सकते हैं।
और यह भी सच है कि हर बुजुर्ग हमेशा सही नहीं होता।
कुछ बुजुर्ग नई पीढ़ी की स्वतंत्रता स्वीकार नहीं कर पाते। कभी वे बच्चों के वैवाहिक जीवन में जरूरत से ज्यादा हस्तक्षेप करते हैं। कभी उनकी अपेक्षाएं इतनी अधिक होती हैं कि साथ रहना दोनों पीढ़ियों के लिए तनावपूर्ण हो जाता है। इसलिए सिर्फ युवा पीढ़ी को दोषी ठहराना भी न्यायपूर्ण नहीं है। लेकिन यहां एक फर्क समझना जरूरी है।
अलग रहना और अलग कर देना एक बात नहीं है।
एक ही छत के नीचे रहना जरूरी नहीं, लेकिन एक-दूसरे के जीवन में मौजूद रहना जरूरी है।
असली समस्या युवा बनाम बुजुर्ग नहीं, संवाद की कमी है
दो पीढ़ियों के बीच सोच अलग होना स्वाभाविक है।
बुजुर्गों ने एक अलग समय देखा है।
युवा एक अलग दुनिया में जी रहे हैं।
बुजुर्ग कहते हैं :— “हमारे समय में ऐसा नहीं होता था।”
युवा कहते हैं :— “आज का समय अलग है।”
यहीं से टकराव शुरू हो सकता है। लेकिन हर मतभेद रिश्ते का अंत नहीं होना चाहिए। बुजुर्गों को भी समझना होगा कि बच्चों का जीवन उनके जीवन की हूबहू प्रतिलिपि नहीं हो सकता।
और बच्चों को भी समझना होगा कि माता-पिता की हर सलाह हस्तक्षेप नहीं होती, कई बार वह उनके अनुभव से निकली चिंता होती है।
जहां संवाद खत्म होता है, वहां गलतफहमियां शुरू होती हैं।
इसलिए सवाल यह नहीं कि कौन जीते।
सवाल यह है कि रिश्ता कैसे बचे।
क्या हमने बुजुर्गों को “जिम्मेदारी” समझना शुरू कर दिया?
यह शायद सबसे असहज सवाल है।
बच्चे छोटे होते हैं तो उनकी देखभाल करना हमें बोझ नहीं लगता। उनके स्कूल का काम, उनका खाना, उनकी बीमारी, उनकी शरारतें, सब जीवन का हिस्सा लगते हैं। लेकिन माता-पिता बूढ़े होते हैं तो अचानक उनकी दवाइयां, डॉक्टर के पास ले जाना, उनकी जरूरतें, उनके साथ समय बिताना, क्या कभी-कभी हमें “जिम्मेदारी” लगने लगता है? यहीं मानसिकता पर सवाल उठता है।माता-पिता कोई जिम्मेदारी की फाइल नहीं हैं, जिसे जीवन की परिस्थितियों के अनुसार किसी और के पास भेज दिया जाए। वे हमारे जीवन की वह पीढ़ी हैं, जिसके कारण हम आज यहां हैं।
ओल्ड एज होम बढ़ना केवल सुविधा नहीं, एक सामाजिक सवाल भी है
ओल्ड एज होम अपने आप में गलत नहीं हैं। कई वरिष्ठ नागरिक वहां सुरक्षित, सम्मानजनक और सक्रिय जीवन जीते हैं। कुछ अपनी इच्छा से भी ऐसे स्थान चुनते हैं। सरकार की वरिष्ठ नागरिक योजनाओं में भी सुरक्षित आवास और सहायता की आवश्यकता को मान्यता दी गई है। लेकिन सवाल फिर भी पूछा जाना चाहिए :— क्या हमारे शहरों को बुजुर्गों के लिए मनोरंजन, संवाद, स्वास्थ्य और सक्रिय जीवन के स्थान ज्यादा चाहिए थे, या ऐसे स्थान जहां वे अपने परिवार से दूर जीवन का अंतिम पड़ाव गुजारें? ओल्ड एज होम को दोष देना उद्देश्य नहीं है। उस मानसिकता पर सवाल करना उद्देश्य है, जिसने कभी-कभी अपने ही माता-पिता के लिए “घर” को विकल्प और “ओल्ड एज होम” को समाधान बना दिया।
पचास साल में आखिर ऐसा क्या बदल गया?
यह कहना इतिहास की दृष्टि से सही नहीं होगा कि पचास साल पहले बुजुर्गों की कोई समस्या नहीं थी।
समस्याएं तब भी थीं।
लेकिन परिवारों की संरचना और जीवनशैली में बड़ा बदलाव आया है।
पहले कई पीढ़ियां एक ही घर में रहती थीं। आज लोग शिक्षा और रोजगार के लिए दूर जाते हैं। पहले परिवार का आकार बड़ा था, आज छोटा है। पहले सामाजिक जीवन का बड़ा हिस्सा परिवार और पड़ोस में था, आज डिजिटल दुनिया ने उसका बड़ा हिस्सा बदल दिया है। इस बदलाव ने सुविधाएं बढ़ाई हैं, लेकिन रिश्तों की चुनौतियां भी बदली हैं। इसलिए सवाल
यह नहीं :— “पहले सब अच्छा था और आज सब खराब है।”
सवाल यह है :— “क्या आधुनिक जीवन की सुविधाएं हासिल करते-करते हमने रिश्तों की कुछ जरूरी सुविधाएं खो दीं?”
समय की कमी हो सकती है।
दूरी हो सकती है।
पर क्या अपनापन भी कम होना जरूरी है?
अगर साथ रहना संभव नहीं तो क्या रिश्ता भी दूर हो जाना चाहिए?
नहीं :—
किसी बेटे या बेटी का दूसरे शहर में रहना अपने आप में अपराध नहीं।
लेकिन माता-पिता से महीनों बात न करना, उनकी बीमारी की खबर न लेना, उनके अकेलेपन को न समझना या यह मान लेना कि पैसे भेज देना ही सारी जिम्मेदारी है, यह जरूर आत्ममंथन का विषय है।
साथ रहना संभव न हो तो भी :—
हर दिन फोन किया जा सकता है।
नियमित वीडियो कॉल हो सकती है।
महीने में एक मुलाकात की योजना बन सकती है।
उनकी दवाओं और स्वास्थ्य की निगरानी की जा सकती है।
जरूरत के समय पड़ोसी या रिश्तेदार को संपर्क में रखा जा सकता है।
और सबसे महत्वपूर्ण :—
उन्हें यह महसूस कराया जा सकता है कि वे अकेले घर में रहते हैं, परिवार से अकेले नहीं हैं।
अकेले रहने वाले बुजुर्गों के लिए सुरक्षा, पहले से तैयारी क्यों जरूरी?
यदि कोई बुजुर्ग या बुजुर्ग दंपति अकेले रहता है तो भावनात्मक सुरक्षा के साथ भौतिक सुरक्षा भी जरूरी है। अचानक स्वास्थ्य खराब होना, गिर जाना, आग या गैस की समस्या, चोरी, हमला या साइबर ठगी जैसी परिस्थितियों के लिए पहले से तैयारी होनी चाहिए।
कुछ जरूरी बातें :—
आपातकालीन संपर्क: परिवार, डॉक्टर और भरोसेमंद पड़ोसियों के नंबर फोन और कागज दोनों पर रखें।
112 की जानकारी: भारत का एकीकृत आपातकालीन नंबर 112 है।
Elderline 14567: केंद्र सरकार की National Helpline for Senior Citizens 14567 सभी राज्यों/केंद्रशासित प्रदेशों में उपलब्ध है और सप्ताह के सातों दिन सुबह 8 बजे से रात 8 बजे तक संचालित होती है। यह जानकारी, मार्गदर्शन, भावनात्मक सहायता और जरूरत पड़ने पर फील्ड इंटरवेंशन जैसी सहायता देती है।
भरोसेमंद पड़ोसी: कम से कम एक-दो लोगों को पता हो कि बुजुर्ग अकेले रहते हैं।
नियमित संपर्क: परिवार में तय हो कि रोज या निश्चित अंतराल पर फोन किया जाएगा और फोन न उठने पर कौन घर जाकर देखेगा।
घर की सुरक्षा: मजबूत ताले, पर्याप्त रोशनी, पीपहोल/डोर-चेन और आवश्यकता के अनुसार CCTV या अलार्म उपयोगी हो सकते हैं।
स्वास्थ्य तैयारी: जरूरी दवाइयां, डॉक्टर का नंबर, मेडिकल रिपोर्ट और दवाओं की सूची आसानी से उपलब्ध हो।
गिरने से बचाव: बाथरूम और सीढ़ियों में फिसलन कम करने तथा पर्याप्त रोशनी की व्यवस्था हो।
डिजिटल सुरक्षा: OTP, PIN, पासवर्ड और बैंक संबंधी जानकारी किसी अनजान व्यक्ति से साझा न करें।
सुरक्षा का अर्थ घर को किला बनाना नहीं है।
सुरक्षा का अर्थ यह सुनिश्चित करना है कि संकट आने पर मदद कितनी जल्दी पहुंचेगी।
बुजुर्ग अपने अधिकार भी जानें
सम्मान केवल परिवार की भावना नहीं है; वरिष्ठ नागरिकों के लिए भारत में कानूनी सुरक्षा का ढांचा भी मौजूद है।
Maintenance and Welfare of Parents and Senior Citizens Act, 2007 में माता-पिता और वरिष्ठ नागरिकों के भरण-पोषण, Maintenance Tribunal, चिकित्सा सहायता, जीवन और संपत्ति की सुरक्षा तथा कुछ परिस्थितियों में संपत्ति हस्तांतरण को निरस्त करने जैसे प्रावधान हैं। अधिनियम में वरिष्ठ नागरिक के परित्याग से संबंधित प्रावधान भी शामिल हैं।
इसलिए बुजुर्गों को चाहिए कि वे :—
अपनी संपत्ति और जरूरी दस्तावेज व्यवस्थित रखें।
बैंक खाते, नामांकन और अन्य वित्तीय जानकारी सुरक्षित रखें।
संपत्ति किसी को हस्तांतरित करने से पहले कानूनी सलाह लें।
किसी प्रकार के शोषण, परित्याग या संपत्ति संबंधी विवाद की स्थिति में चुप न रहें।
जरूरत पड़ने पर स्थानीय विधिक सेवा प्राधिकरण, संबंधित सरकारी विभाग या योग्य कानूनी सलाहकार से सहायता लें।
14567 Elderline के माध्यम से जानकारी और मार्गदर्शन भी प्राप्त कर सकते हैं।
कानून रिश्ते नहीं बना सकता, लेकिन जहां अधिकारों का उल्लंघन हो रहा हो, वहां कानून सुरक्षा का रास्ता जरूर देता है।
और अब सबसे कठिन सवाल, दोषी कौन?
क्या युवा दोषी हैं?
कभी हां।
क्या बुजुर्ग दोषी हो सकते हैं?
कभी हां।
क्या परिस्थितियां जिम्मेदार हो सकती हैं?
बहुत बार।
लेकिन शायद सबसे बड़ा दोषी कोई एक व्यक्ति नहीं, बल्कि वह सोच है जो रिश्ते को सुविधा से तौलने लगती है।
अगर युवा कहते हैं :—
“हमारी अपनी जिंदगी है।”
तो बुजुर्गों को भी समझना होगा :—
“हमारे बच्चों की भी अपनी जिंदगी है।”
लेकिन इसके बीच एक तीसरी बात भी है।
अपनी जिंदगी जीना और अपने लोगों को अपनी जिंदगी से निकाल देना, दोनों अलग बातें हैं।
बुजुर्गों को बच्चों की स्वतंत्रता का सम्मान करना होगा।
बच्चों को बुजुर्गों की गरिमा का।
यहीं से परिवार बच सकता है।
शायद हमें अपने बचपन की तरफ एक बार लौटकर देखना चाहिए
जब हम छोटे थे तो क्या हमें कभी यह बताया गया था कि :—
“तुम हमारे साथ इसलिए रह सकते हो क्योंकि तुम सुविधाजनक हो?”
नहीं।
माता-पिता ने हमें इसलिए नहीं पाला कि भविष्य में हम उनके लिए कोई लाभ का सौदा बनेंगे।
उन्होंने हमें इसलिए पाला क्योंकि हम उनके बच्चे थे।
हमारे बचपन में उन्होंने हमारी गलतियों को कितनी बार माफ किया।
हम गिरते थे, वे उठाते थे।
हम डरते थे, वे हिम्मत देते थे।
हम बीमार होते थे, वे रात भर जागते थे।
हम परीक्षा में कम नंबर लाते थे, वे अगली बार बेहतर करने की उम्मीद देते थे।
हम असफल होते थे, वे कहते थे, “कोई बात नहीं, फिर कोशिश करना।”
आज जब उनकी उम्र उन्हें कमजोर करती है तो क्या हमारी बारी आने पर हमारा जवाब केवल इतना हो सकता है।
“हमारे पास समय नहीं है”?
एक निर्णय जो हमें कभी नहीं लेना चाहिए
किसी परिवार को परिस्थितियों के कारण अलग रहना पड़ सकता है।
लेकिन एक विचार को सामान्य नहीं बनने देना चाहिए।
“अब मां-बाप को अपने साथ रखना है या नहीं, यह भी जीवन की सुविधा का एक विकल्प है।”
यही वह मानसिकता है जिस पर हमें रुककर सोचना चाहिए।
माता-पिता के साथ रहना हर परिस्थिति में संभव हो, यह जरूरी नहीं।
लेकिन उनके लिए अपने जीवन में जगह बनाना जरूरी है।
अगर एक ही घर में रहना संभव नहीं तो पास में रहिए।
पास रहना संभव नहीं तो नियमित संपर्क में रहिए।
हर दिन मिलना संभव नहीं तो उनकी जरूरत के समय उपलब्ध रहिए।
लेकिन उन्हें यह महसूस मत होने दीजिए कि :—
“अब हमारे अपने बच्चों की जिंदगी में हमारे लिए जगह नहीं बची।”
वरिष्ठ नागरिक दिवस पर हम बुजुर्गों को शुभकामना दे सकते हैं, उनके पैर छू सकते हैं, सोशल मीडिया पर उनकी तस्वीर लगा सकते हैं और उनके सम्मान की बातें कर सकते हैं। लेकिन शायद इस दिन हमें इससे थोड़ा आगे जाना चाहिए।आज अपने घर में बैठे किसी बुजुर्ग को देखिए। उनके चेहरे की झुर्रियों में शायद आपके बचपन की कहानी छिपी है। उनके हाथों की कठोरता में शायद आपकी परवरिश की मेहनत है। उनकी आंखों में शायद वह बच्चा आज भी मौजूद है, जिसे उन्होंने कभी अपनी पूरी दुनिया समझा था। और शायद आज वे आपसे कुछ मांग भी नहीं रहे।
न पैसा।
न संपत्ति।
न कोई बड़ा त्याग।
शायद वे केवल यह चाहते हैं कि उनके अपने लोग उन्हें अपने ही जीवन में अनावश्यक न समझें।
हम आधुनिक हो सकते हैं।
हम स्वतंत्र हो सकते हैं।
हम दुनिया के किसी भी कोने में अपना भविष्य बना सकते हैं।
लेकिन आधुनिकता का अर्थ यह नहीं हो सकता कि जिसने हमारा बचपन संभाला, उसके बुढ़ापे के लिए हमारे पास संवेदना ही न बचे।
हर बुजुर्ग को हर परिस्थिति में अपने बच्चों के साथ रहना चाहिए, यह कहना वास्तविक जीवन को बहुत सरल बना देना होगा। लेकिन किसी बुजुर्ग को यह महसूस होना कि उसके अपने बच्चे उसे अपने जीवन में रखना नहीं चाहते—यह जरूर ऐसा सवाल है, जिसका सामना पूरे समाज को करना चाहिए।
क्योंकि सवाल केवल यह नहीं है कि :—
“बुजुर्ग हमारे साथ क्यों नहीं रहते?”
सवाल यह भी है :—
“क्या हमने उनके साथ रहने की इच्छा खो दी है?”
और शायद सबसे बड़ा सवाल :—
“जिस बच्चे का बचपन उसके माता-पिता की पूरी दुनिया था, उसके बड़े हो जाने के बाद माता-पिता उसकी दुनिया का इतना छोटा हिस्सा क्यों रह गए?”
माता-पिता ने हमारे बचपन में हमारे लिए जगह नहीं तलाश की थी, उन्होंने अपने पूरे जीवन में हमारे लिए जगह बनाई थी। अब उनके बुढ़ापे में हमें अपने जीवन में उनके लिए जगह तलाशने की नहीं, जगह बनाने की जरूरत है। साथ रहना हर परिस्थिति में संभव नहीं हो सकता, लेकिन अपनापन, सम्मान और जिम्मेदारी कभी विकल्प नहीं होने चाहिए।
(डिस्क्लेमर :- यह सामग्री सामाजिक जागरूकता और विचार-विमर्श के उद्देश्य से है। प्रत्येक परिवार की परिस्थितियां अलग होती हैं। बुजुर्गों अथवा परिवार के किसी सदस्य से जुड़े स्वास्थ्य, सुरक्षा, संपत्ति या कानूनी विवाद में संबंधित विशेषज्ञ, सरकारी प्राधिकरण या योग्य कानूनी सलाहकार से उचित सलाह लें।)



