मां की गोद में स्नेह, चेहरे पर करुणा और स्वरूप में शक्ति, मां स्कंदमाता सिखाती हैं कि सच्ची शक्ति केवल विजय प्राप्त करने में नहीं, बल्कि प्रेम, संरक्षण और जीवन को सही दिशा देने में भी होती है।
भारतीय संस्कृति में मां को प्रेम, त्याग, करुणा और सुरक्षा का प्रतीक माना गया है। मां स्वयं कितनी भी कठिनाइयों से गुजर रही हो, अपनी संतान के सुख और सुरक्षा के लिए हमेशा तत्पर रहती है। मां के इसी वात्सल्य और संरक्षण की दिव्य अभिव्यक्ति हैं मां स्कंदमाता, जिनकी आराधना शारदीय नवरात्रि के पांचवें दिन की जाती है। आज गुरुवार, 15 अक्टूबर 2026 को शारदीय नवरात्रि की पंचमी तिथि पर मां दुर्गा के पांचवें स्वरूप स्कंदमाता की पूजा-अर्चना की जा रही है।धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, मां स्कंदमाता की आराधना से भक्तों को सुख, शांति, बुद्धि, साहस और पारिवारिक कल्याण का आशीर्वाद प्राप्त होता है। विशेष रूप से संतान की सुख-समृद्धि और सुरक्षा की कामना से उनकी पूजा का महत्व बताया गया है।लेकिन इस आराधना का संदेश केवल धार्मिक अनुष्ठानों तक सीमित नहीं है। यह हमें याद दिलाती है कि संतान का पालन-पोषण केवल भोजन, वस्त्र और सुविधाएं उपलब्ध कराना नहीं, बल्कि उसे अच्छे संस्कार, शिक्षा, साहस और सही दिशा देना भी है।
मां स्कंदमाता कौन हैं? जानिए उनका दिव्य स्वरूप
पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, भगवान शिव और माता पार्वती के पुत्र भगवान कार्तिकेय को स्कंद भी कहा जाता है। स्कंद की माता होने के कारण देवी का नाम स्कंदमाता पड़ा। भगवान कार्तिकेय को देवताओं का सेनापति माना जाता है। धार्मिक कथाओं में उनका संबंध साहस, पराक्रम और अधर्म के विरुद्ध संघर्ष से बताया गया है। मां स्कंदमाता को सामान्यतः चार भुजाओं वाली देवी के रूप में दर्शाया जाता है। उनकी गोद में बाल रूप में भगवान कार्तिकेय विराजमान रहते हैं। देवी की दो भुजाओं में कमल के पुष्प सुशोभित रहते हैं। एक भुजा से वे भगवान कार्तिकेय को संभाले रहती हैं। चौथी भुजा वरद मुद्रा में दिखाई देती है। उनका वाहन सिंह है और वे कमल के आसन पर भी विराजमान दिखाई जाती हैं। कमल पर विराजमान होने के कारण उन्हें पद्मासना देवी भी कहा जाता है। उनके स्वरूप में सिंह साहस और शक्ति का प्रतीक है, जबकि कमल पवित्रता और आध्यात्मिक चेतना का प्रतीक माना जाता है। मां की गोद में बालक कार्तिकेय और उनके साथ सिंह का होना एक सुंदर संदेश देता है। ममता और वीरता एक-दूसरे के विरोधी नहीं, बल्कि जीवन की पूरक शक्तियां हैं।
नवरात्रि के पांचवें दिन का विशेष धार्मिक महत्व
नवरात्रि के नौ दिनों में मां दुर्गा के नौ स्वरूपों की आराधना की जाती है। प्रत्येक स्वरूप जीवन के किसी विशेष गुण, शक्ति और आध्यात्मिक संदेश से जुड़ा माना जाता है। पांचवें दिन मां स्कंदमाता की पूजा का विशेष महत्व इसलिए है क्योंकि उन्हें मातृत्व, संरक्षण, करुणा और ज्ञान का प्रतीक माना गया है। धार्मिक विश्वास है कि उनकी आराधना से मन को शांति मिलती है, पारिवारिक जीवन में सद्भाव बढ़ता है और संतान के कल्याण की कामना पूरी होती है। इस दिन कुछ परंपराओं में ललिता पंचमी अथवा उपांग ललिता व्रत भी मनाया जाता है, जिसमें देवी ललिता की आराधना की जाती है। इस प्रकार नवरात्रि की पंचमी देवी उपासना की विविध परंपराओं को जोड़ने वाला विशेष अवसर भी है।
आज की पंचमी तिथि और शुभ मुहूर्त
दिनांक : गुरुवार, 15 अक्टूबर 2026
पर्व : शारदीय नवरात्रि का पांचवां दिन
आराध्य देवी : मां स्कंदमाता
तिथि : आश्विन शुक्ल पंचमी
पंचमी तिथि 15 अक्टूबर की प्रातः से प्रभावी है और 16 अक्टूबर को प्रातः लगभग 3:25 बजे समाप्त होगी।
पंचांग के अनुसार प्रमुख शुभ समय
ब्रह्म मुहूर्त :- प्रातः 4:38 से 5:28 बजे तक।
सूर्योदय :- प्रातः लगभग 6:17 बजे।
अभिजीत मुहूर्त :- पूर्वाह्न 11:43 से दोपहर 12:29 बजे तक।
गोधूलि मुहूर्त :- सायं लगभग 5:55 से 6:20 बजे तक।
राहुकाल :- दोपहर लगभग 1:33 से 3:00 बजे तक।
विशेष ध्यान दें :- ये समय भोपाल के स्थानीय पंचांग पर आधारित हैं। छत्तीसगढ़ सहित अन्य स्थानों पर सूर्योदय और मुहूर्त में कुछ मिनटों का अंतर हो सकता है। मां स्कंदमाता की सामान्य पूजा प्रातः स्नान के बाद श्रद्धापूर्वक की जा सकती है। अभिजीत मुहूर्त सामान्य शुभ समय है, इसे केवल स्कंदमाता पूजा के लिए निर्धारित अनिवार्य समय न समझें।
मां स्कंदमाता की पूजा सामग्री
पूजा के लिए मां स्कंदमाता का चित्र या प्रतिमा, स्वच्छ आसन, लाल या पीला वस्त्र, अक्षत, रोली, कुमकुम, चंदन, पुष्प, धूप, दीपक, घी, फल, मिठाई, जल और नैवेद्य की व्यवस्था की जा सकती है।परंपरागत रूप से मां स्कंदमाता को केले का भोग अर्पित करना शुभ माना जाता है। कमल के पुष्प का विशेष महत्व बताया जाता है, लेकिन उपलब्धता के अनुसार अन्य स्वच्छ पुष्प भी अर्पित किए जा सकते हैं। पूजा में सामग्री की अधिकता से अधिक महत्व श्रद्धा, स्वच्छता और मन की पवित्रता का माना गया है।
मां स्कंदमाता की सरल पूजा विधि
1. स्नान और संकल्प :- प्रातः स्नान करके स्वच्छ वस्त्र धारण करें। पूजा स्थल की सफाई करें और मन में देवी की आराधना का संकल्प लें।
2. देवी का ध्यान :- पूजा स्थान पर मां स्कंदमाता का चित्र या प्रतिमा स्थापित करें। नवरात्रि के प्रथम दिन स्थापित कलश का भी परंपरा के अनुसार पूजन करें।
3. दीप प्रज्वलन :- घी या तेल का दीपक जलाएं। धूप अर्पित करें और मां का ध्यान करें।
4. पुष्प और पूजन सामग्री अर्पित करें :- देवी को रोली, कुमकुम, अक्षत, चंदन और पुष्प चढ़ाएं।
5. भोग लगाएं :- मां को केला, फल, मिठाई अथवा घर में तैयार सात्विक प्रसाद अर्पित करें।
6. मंत्र जाप :- मां स्कंदमाता के मंत्र का श्रद्धापूर्वक जाप करें। भक्त अपनी क्षमता और परंपरा के अनुसार 11, 21 या 108 बार मंत्र का उच्चारण कर सकते हैं।
7. आरती और प्रार्थना :- अंत में मां दुर्गा अथवा स्कंदमाता की आरती करें। परिवार, बच्चों और समस्त प्राणियों के कल्याण की प्रार्थना करें।
8. प्रसाद वितरण :- पूजा के बाद परिवार के सदस्यों और उपस्थित श्रद्धालुओं में प्रसाद वितरित करें।
मां स्कंदमाता के विशेष मंत्र
मुख्य पूजा मंत्र :– ॐ देवी स्कन्दमातायै नमः॥
यह मां स्कंदमाता की आराधना का सरल और प्रचलित मंत्र है।
ध्यान मंत्र :– सिंहासनगता नित्यं पद्माश्रितकरद्वया।
शुभदास्तु सदा देवी स्कन्दमाता यशस्विनी॥
प्रार्थना मंत्र :- या देवी सर्वभूतेषु मातृरूपेण संस्थिता।
नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः॥
यह देवी की मातृशक्ति को नमन करने वाला प्रसिद्ध मंत्र है।
इन मंत्रों का जाप श्रद्धा और एकाग्रता के साथ किया जा सकता है। धार्मिक परंपराओं में मंत्रों के पाठ और उच्चारण के अलग-अलग रूप भी मिलते हैं।
मां स्कंदमाता की आराधना से मिलने वाला जीवन संदेश
मां स्कंदमाता का स्वरूप हमें मातृत्व की महानता के साथ एक महत्वपूर्ण सामाजिक जिम्मेदारी की याद भी दिलाता है। आज बच्चों के सामने शिक्षा, प्रतिस्पर्धा, तकनीक, सामाजिक दबाव और बदलती जीवनशैली जैसी अनेक चुनौतियां हैं। ऐसे समय में माता-पिता का दायित्व केवल बच्चों की इच्छाएं पूरी करना नहीं, बल्कि उनके भीतर आत्मविश्वास, संवेदनशीलता और अच्छे संस्कार विकसित करना भी है। भगवान कार्तिकेय को साहस और नेतृत्व का प्रतीक माना जाता है। उनकी माता स्कंदमाता की आराधना हमें यह सोचने का अवसर देती है कि हर बच्चे को ऐसा वातावरण मिले, जहां वह भय से मुक्त होकर सीख सके, आगे बढ़ सके और अपने जीवन की क्षमताओं को पहचान सके। मातृत्व का सम्मान करने का अर्थ केवल देवी की पूजा करना नहीं, बल्कि अपने घर और समाज में माताओं के श्रम, त्याग, स्वास्थ्य, शिक्षा और सम्मान को भी महत्व देना है। नवरात्रि की सार्थकता तब और बढ़ जाती है, जब देवी के प्रति हमारी श्रद्धा हमारे व्यवहार में भी दिखाई दे।
ममता में ही छिपी है सबसे बड़ी शक्ति
मां स्कंदमाता की आराधना प्रेम, करुणा, साहस और संरक्षण का संदेश देती है।
उनका दिव्य स्वरूप हमें याद दिलाता है कि जीवन में शक्ति का वास्तविक उद्देश्य केवल स्वयं शक्तिशाली बनना नहीं, बल्कि दूसरों को सुरक्षा, सहयोग और आगे बढ़ने का अवसर देना भी है। नवरात्रि के इस पावन अवसर पर हम प्रार्थना करें कि हर परिवार में प्रेम बना रहे, हर माता को सम्मान मिले और हर बच्चे को सुरक्षित, शिक्षित और संस्कारवान जीवन प्राप्त हो।मां स्कंदमाता की कृपा से सभी के जीवन में सुख, शांति, साहस और सद्बुद्धि का संचार हो।
जय माता दी! जय मां स्कंदमाता!
(डिस्क्लेमर :- यह लेख धार्मिक मान्यताओं, पौराणिक कथाओं, प्रचलित पूजा परंपराओं और उपलब्ध पंचांग संबंधी जानकारी पर आधारित है। इसका उद्देश्य पाठकों को नवरात्रि के पांचवें दिन मां स्कंदमाता की आराधना के धार्मिक और सांस्कृतिक महत्व से परिचित कराना है। पूजा विधि, मंत्र, भोग और धार्मिक परंपराओं में क्षेत्र, परिवार एवं संप्रदाय के अनुसार भिन्नताएं संभव हैं। शुभ मुहूर्त स्थान विशेष के अनुसार बदल सकते हैं। पाठक अपने स्थानीय पंचांग और पारिवारिक परंपराओं के अनुसार पूजा कर सकते हैं। धार्मिक मान्यताओं से जुड़े फल और आशीर्वाद आस्था के विषय हैं, इन्हें वैज्ञानिक रूप से प्रमाणित परिणाम न समझा जाए। इस लेख का उद्देश्य किसी भी धार्मिक भावना या परंपरा को ठेस पहुंचाना नहीं है।)



