आज 19 सितंबर 2026, शनिवार को देशभर में राधा अष्टमी का पर्व श्रद्धा और भक्ति के साथ मनाया जा रहा है। भाद्रपद मास के शुक्ल पक्ष की अष्टमी तिथि को मनाई जाने वाली राधा अष्टमी को परंपरा में श्रीराधा के प्राकट्य दिवस के रूप में माना जाता है। ब्रज क्षेत्र के बरसाना, वृंदावन और मथुरा में इस पर्व का विशेष महत्व है। राधा अष्टमी केवल एक धार्मिक पर्व नहीं, बल्कि भारतीय भक्ति परंपरा में प्रेम, समर्पण, विश्वास, संवेदना और आत्मिक जुड़ाव का प्रतीक भी मानी जाती है। राधा और कृष्ण का संबंध भारतीय संस्कृति में प्रेम के ऐसे आदर्श के रूप में देखा गया है, जिसमें प्रेम केवल पाने का नाम नहीं, बल्कि समझने, सम्मान करने और स्वयं से पहले दूसरे के सुख को महत्व देने का भाव भी है। आज जब रिश्तों में संवाद कम हो रहा है, छोटी-छोटी बातों पर मनमुटाव बढ़ रहा है और सोशल मीडिया के दौर में वास्तविक संबंधों के लिए समय कम होता जा रहा है, तब राधा अष्टमी का संदेश और भी प्रासंगिक दिखाई देता है।
राधा अष्टमी कब और क्यों मनाई जाती है?
हिंदू पंचांग के अनुसार राधा अष्टमी भाद्रपद मास के शुक्ल पक्ष की अष्टमी तिथि को मनाई जाती है। धार्मिक परंपरा के अनुसार इसी दिन बरसाना में श्रीराधा का प्राकट्य हुआ था। यह पर्व श्रीकृष्ण जन्माष्टमी के लगभग 15 दिन बाद आता है। राधा अष्टमी पर भक्त राधा-कृष्ण की पूजा, व्रत, भजन-कीर्तन और स्मरण करते हैं। ब्रज क्षेत्र में इस अवसर पर विशेष धार्मिक आयोजन होते हैं और बड़ी संख्या में श्रद्धालु मंदिरों में पहुंचते हैं।
राधा कौन हैं? केवल कृष्ण की प्रिय नहीं, भक्ति की प्रतीक
भारतीय धार्मिक और भक्ति परंपरा में श्रीराधा को भगवान श्रीकृष्ण के प्रति पूर्ण प्रेम और भक्ति का प्रतीक माना गया है। राधा-कृष्ण की कथा में प्रेम को केवल सांसारिक आकर्षण के रूप में नहीं, बल्कि आत्मीयता, विश्वास और ईश्वर के प्रति समर्पण के भाव से भी समझा गया है।इसीलिए राधा का नाम कृष्ण से पहले लिया जाता है :— ‘राधे-कृष्ण’।
भक्ति परंपरा में राधा का चरित्र यह संदेश देता है कि सच्चे प्रेम में अधिकार से अधिक विश्वास, अपेक्षा से अधिक समर्पण और दिखावे से अधिक भाव की आवश्यकता होती है।
राधा-कृष्ण का प्रेम आज के जीवन को क्या सिखाता है?
आज रिश्ते पहले की तुलना में कई तरह से बदल गए हैं। परिवार छोटे हुए हैं, जीवन की गति तेज हुई है और तकनीक ने लोगों को एक-दूसरे से जोड़ने के साथ-साथ कई बार भावनात्मक रूप से दूर भी किया है। ऐसे समय में राधा-कृष्ण की भक्ति परंपरा से कुछ महत्वपूर्ण जीवन-मूल्य समझे जा सकते हैं।
प्रेम में सम्मान जरूरी है
किसी भी रिश्ते की मजबूती केवल प्रेम से नहीं, बल्कि सम्मान से भी होती है। पति-पत्नी, माता-पिता और बच्चों, भाई-बहन या मित्रों, हर रिश्ते में सामने वाले की भावनाओं को महत्व देना आवश्यक है।
रिश्ते केवल अधिकार से नहीं चलते
‘तुम मेरे हो’ कह देना आसान है, लेकिन ‘तुम खुश रहो’ कहने के लिए बड़ा दिल चाहिए।।सच्चे रिश्ते में सामने वाले को नियंत्रित करने के बजाय उसे समझने की कोशिश होती है।
संवाद रिश्तों की नींव है
कई रिश्ते बड़ी वजहों से नहीं, बल्कि छोटी-छोटी गलतफहमियों और संवाद की कमी से टूटते हैं।।इसलिए मन में बात रखने के बजाय सही समय पर शांतिपूर्वक बात करना जरूरी है।
प्रेम में त्याग भी होता है
हर रिश्ता केवल अपनी इच्छाओं की पूर्ति का माध्यम नहीं है। कई बार परिवार और रिश्तों को बचाने के लिए अपनी सुविधा से थोड़ा पीछे हटना पड़ता है।
राधा अष्टमी और परिवार
राधा अष्टमी का एक महत्वपूर्ण सामाजिक संदेश परिवार से भी जुड़ सकता है। आज कई परिवारों में एक साथ रहने के बावजूद लोगों के बीच बातचीत कम हो गई है। बच्चे मोबाइल में व्यस्त हैं, माता-पिता अपने काम में और बुजुर्ग कई बार अकेलेपन का अनुभव करते हैं। ऐसे में आज का दिन परिवार को एक साथ बैठने का अवसर बन सकता है। पूजा के बाद कुछ समय परिवार के साथ बैठें। बच्चों को राधा-कृष्ण की कथा सुनाएं। उनसे पूछें कि उनके लिए प्रेम और मित्रता का क्या अर्थ है। बुजुर्गों से उनके अनुभव सुनें।त्योहार तभी सार्थक होता है जब वह घर के लोगों को एक-दूसरे के और करीब लाए।
बच्चों को राधा अष्टमी से क्या सिखाएं?
बच्चों को केवल यह बताना पर्याप्त नहीं कि आज राधा अष्टमी है। उन्हें यह भी बताया जा सकता है कि भारतीय संस्कृति में त्योहारों के पीछे जीवन-मूल्य छिपे होते हैं। बच्चों से चर्चा की जा सकती है:—
* मित्रता में विश्वास क्यों जरूरी है?
* किसी की भावनाओं का सम्मान कैसे करें?
* क्या प्रेम का अर्थ केवल अपनी इच्छा पूरी करना है?
* किसी के दुख में उसके साथ खड़ा होना क्यों जरूरी है?
*.परिवार में छोटे-बड़े सभी की बात सुनना क्यों चाहिए?
इस तरह धार्मिक पर्व बच्चों के लिए संस्कार और जीवन-शिक्षा का अवसर भी बन सकता है।
राधा अष्टमी 2026: शुभ मुहूर्त और तिथि
आज 19 सितंबर 2026, शनिवार को राधा अष्टमी का पर्व मनाया जा रहा है। पंचांग गणना के अनुसार भाद्रपद शुक्ल पक्ष की अष्टमी तिथि 18 सितंबर को दोपहर लगभग 1 बजे शुरू हुई और 19 सितंबर को दोपहर 3:26 बजे तक रहेगी। राधा अष्टमी की पूजा के लिए मध्याह्न काल को विशेष रूप से शुभ माना जाता है। पंचांग के अनुसार आज मध्याह्न पूजा का शुभ समय सुबह 11:01 बजे से दोपहर 1:28 बजे तक है। यह अवधि लगभग 2 घंटे 27 मिनट की है। राधा अष्टमी की पूजा में मध्याह्न काल का महत्व इसलिए माना जाता है क्योंकि धार्मिक परंपरा में श्रीराधा के प्राकट्य को मध्याह्न काल से जोड़ा गया है। इसलिए भक्त इस अवधि में राधा-कृष्ण की पूजा, अभिषेक, श्रृंगार, भोग, मंत्र-जप और आरती कर सकते हैं।
आज के प्रमुख समय एक नजर में
राधा अष्टमी: 19 सितंबर 2026, शनिवार
अष्टमी तिथि समाप्त: दोपहर लगभग 3:26 बजे
मध्याह्न पूजा मुहूर्त: सुबह 11:01 बजे से दोपहर 1:28 बजे तक (दिल्ली के पंचांग के अनुसार)
पूजा की अवधि: लगभग 2 घंटे 27 मिनट
विशेष ध्यान: स्थानीय सूर्योदय-सूर्यास्त और स्थान के अनुसार मुहूर्त में कुछ मिनट का अंतर हो सकता है।
इसलिए यदि आप अपने शहर में पूजा कर रहे हैं तो स्थानीय पंचांग के अनुसार समय को प्राथमिकता देना उचित रहेगा। विशेष रूप से छत्तीसगढ़ जैसे अन्य स्थानों के लिए दिल्ली का समय हूबहू लागू मानने के बजाय स्थानीय पंचांग देखना बेहतर है।
धार्मिक सूचना: शुभ मुहूर्त और पंचांग की गणना स्थान तथा परंपरा के अनुसार कुछ मिनट अलग हो सकती है। ऊपर दिया गया समय संदर्भित पंचांग गणना पर आधारित है। पाठक अपने स्थानीय पंचांग या परंपरा के अनुसार समय में आवश्यक समायोजन करें।
राधा अष्टमी की पूजा-विधि
राधा अष्टमी पर अलग-अलग क्षेत्रों और परिवारों में पूजा की परंपराओं में अंतर हो सकता है। सामान्य रूप से भक्त सुबह स्नान करके स्वच्छ वस्त्र धारण करते हैं और राधा-कृष्ण की पूजा करते हैं।
सामान्य पूजा सामग्री
* राधा-कृष्ण की प्रतिमा या तस्वीर
* स्वच्छ जल
* पंचामृत
* रोली या कुमकुम
* अक्षत
* फूल और माला
* तुलसी दल
* धूप और दीप
* फल
* मिष्ठान या सात्त्विक भोग
* पंचामृत के लिए दूध, दही, घी, शहद और शक्कर
कुछ परंपराओं में विशेष भोग भी लगाया जाता है। पूजा सामग्री और भोग स्थानीय परंपरा तथा परिवार की श्रद्धा के अनुसार अलग हो सकते हैं।
पूजा की सामान्य विधि
* पूजा स्थल की साफ-सफाई करें।
* राधा-कृष्ण की प्रतिमा या तस्वीर स्थापित करें।
* दीप और धूप प्रज्वलित करें।
* जल तथा पंचामृत से प्रतीकात्मक स्नान कराएं, यदि आपकी परंपरा में यह प्रचलित हो।
* वस्त्र, रोली, अक्षत, फूल और तुलसी अर्पित करें।
* फल एवं सात्त्विक भोग लगाएं।
* राधा-कृष्ण का ध्यान करते हुए मंत्र या नाम-स्मरण करें।
* राधा अष्टमी की कथा या धार्मिक पाठ करें।
* अंत में आरती करें और परिवार की सुख-शांति की प्रार्थना करें।
राधा अष्टमी का मंत्र
भक्त अपनी श्रद्धा और परंपरा के अनुसार मंत्र-जप कर सकते हैं। “ॐ राधायै नमः।” इसके साथ राधा-कृष्ण का नाम-स्मरण और भजन-कीर्तन भी किया जाता है।
व्रत के बारे में जरूरी बात
राधा अष्टमी पर अनेक श्रद्धालु उपवास या व्रत रखते हैं। हालांकि व्रत की अवधि और नियम अलग-अलग परंपराओं में अलग हो सकते हैं। इसलिए केवल धार्मिक मान्यता के आधार पर हर व्यक्ति के लिए एक जैसा कठोर उपवास आवश्यक मानना उचित नहीं है। विशेषकर बच्चे, बुजुर्ग, गर्भवती महिलाएं या किसी स्वास्थ्य समस्या से जूझ रहे लोग अपनी स्थिति के अनुसार भोजन और उपवास का निर्णय लें। भक्ति का अर्थ केवल भूखे रहना नहीं है; मन, व्यवहार और विचारों की शुद्धता भी उतनी ही महत्वपूर्ण है।
राधा अष्टमी पर दान और सेवा
भारतीय परंपरा में पर्वों को सेवा और दान से जोड़ने की भी परंपरा रही है। आज अपनी क्षमता के अनुसार जरूरतमंद व्यक्ति को भोजन कराना, वस्त्र देना, किसी विद्यार्थी की पढ़ाई में सहायता करना, किसी बीमार या अकेले व्यक्ति की मदद करना या किसी जरूरतमंद परिवार तक राशन पहुंचाना भी इस दिन को सार्थक बना सकता है। क्योंकि यदि हमारी पूजा के बाद किसी दूसरे के चेहरे पर मुस्कान आती है, तो त्योहार का सामाजिक अर्थ और गहरा हो जाता है।
राधा अष्टमी का सबसे बड़ा संदेश: प्रेम में शांति
राधा-कृष्ण की भक्ति परंपरा में प्रेम और भक्ति का संबंध बहुत गहरा है। आज दुनिया के अलग-अलग हिस्सों में तनाव, हिंसा और युद्ध की खबरें सामने आती हैं। ऐसे वातावरण में किसी भी धार्मिक पर्व का संदेश केवल व्यक्तिगत आस्था तक सीमित न रहकर मानवता, प्रेम और शांति तक पहुंचना चाहिए। राधा अष्टमी हमें याद दिला सकती है कि मनुष्य के भीतर प्रेम और करुणा का भाव मजबूत होगा तो परिवारों में भी शांति बढ़ेगी और समाज में भी। अगले 21 सितंबर को अंतरराष्ट्रीय शांति दिवस मनाया जाएगा और संयुक्त राष्ट्र ने 2026 के लिए इसका विषय “Invest in Peace – For Everyone, Everywhere, Every Day” रखा है। इस दृष्टि से देखें तो आज राधा अष्टमी पर प्रेम और सद्भाव की बात करना आने वाले शांति दिवस की भावना से भी जुड़ता है।
क्या केवल मंदिर जाना ही पर्याप्त है?
मंदिर जाना, पूजा करना और व्रत रखना श्रद्धा का हिस्सा हो सकता है, लेकिन त्योहार का वास्तविक प्रभाव हमारे व्यवहार में दिखाई देना चाहिए। यदि हम राधा-कृष्ण की पूजा करें लेकिन घर में किसी से बात न करें, किसी की भावनाओं को ठेस पहुंचाएं, जरूरतमंद की मदद करने से बचें या छोटी-सी बात पर रिश्ते तोड़ दें, तो हमें स्वयं से यह प्रश्न पूछना चाहिए कि हमने पर्व का संदेश कितना समझा? भक्ति केवल पूजा की थाली में नहीं, हमारे व्यवहार में भी दिखाई देनी चाहिए।
आज के समय में राधा अष्टमी की प्रासंगिकता
आज का युवा प्रेम, मित्रता और रिश्तों को नए नजरिए से देखता है। सोशल मीडिया ने रिश्तों को बनाने और तोड़ने की गति दोनों बढ़ा दी हैं। ‘लाइक’, ‘फॉलो’ और ‘अनफॉलो’ के इस दौर में वास्तविक रिश्तों की कीमत समझना जरूरी है। राधा अष्टमी हमें यह सोचने का अवसर देती है कि :—
# क्या हमारे रिश्तों में केवल साथ होना है या वास्तव में एक-दूसरे को समझना भी है?
# क्या हम अपने माता-पिता के साथ बैठकर बात करते हैं?
क्या हम अपने बच्चों की बात बिना मोबाइल देखते हुए सुनते हैं?
# क्या हम अपने जीवनसाथी की परेशानी को समझने की कोशिश करते हैं?
# क्या हम अपने मित्र की सफलता में ईर्ष्या के बजाय खुशी महसूस करते हैं?
# यही छोटे-छोटे प्रश्न राधा अष्टमी के संदेश को हमारे रोजमर्रा के जीवन से जोड़ सकते हैं।
एक छोटी-सी पहल आज जरूर करें
आज पूजा के साथ एक संकल्प लिया जा सकता है :—
# कम से कम एक व्यक्ति से बिना किसी स्वार्थ के प्रेम से बात करेंगे।
# किसी नाराज व्यक्ति से संवाद शुरू करेंगे।
# माता-पिता या बुजुर्गों के साथ कुछ समय बैठेंगे।
# बच्चों की बात ध्यान से सुनेंगे।
# और संभव हो तो किसी जरूरतमंद की मदद करेंगे।
# यह छोटी-सी पहल किसी भी बड़े धार्मिक आयोजन से कम महत्वपूर्ण नहीं हो सकती।
राधा अष्टमी श्रीराधा के प्रति श्रद्धा और राधा-कृष्ण भक्ति का महत्वपूर्ण पर्व है। ब्रज की परंपरा में इसकी विशेष महिमा है और देशभर में श्रद्धालु इस दिन पूजा, व्रत, भजन और स्मरण के माध्यम से इसे मनाते हैं।।लेकिन हर त्योहार का एक बाहरी रूप होता है और एक आंतरिक संदेश। राधा अष्टमी का आंतरिक संदेश प्रेम, भक्ति, विश्वास, समर्पण, संवेदना और सद्भाव के रूप में समझा जा सकता है। आज जरूरत इस बात की है कि हम त्योहारों को केवल कैलेंडर की तारीख न बनने दें। उनके संदेश को अपने व्यवहार में उतारें। घर में प्रेम बढ़े, रिश्तों में संवाद बढ़े, मन में अहंकार कम हो, जरूरतमंद के लिए संवेदना बढ़े और समाज में शांति मजबूत हो—तो राधा अष्टमी का पर्व वास्तव में सार्थक होगा।
“राधा अष्टमी हमें याद दिलाती है कि सच्चा प्रेम केवल पाने में नहीं, समझने, सम्मान करने, निभाने और जरूरत पड़ने पर त्याग करने में भी है। आइए, आज राधा-कृष्ण की भक्ति के साथ अपने रिश्तों में प्रेम, विश्वास और शांति बढ़ाने का संकल्प लें।”
(डिस्क्लेमर : यह लेख राधा अष्टमी से जुड़ी धार्मिक परंपराओं, मान्यताओं और सामान्य पूजा-विधि की जानकारी देने के उद्देश्य से तैयार किया गया है। अलग-अलग क्षेत्रों, संप्रदायों और परिवारों में पूजा-पद्धति, व्रत तथा मान्यताओं में अंतर हो सकता है। पाठक इन बातों को अपनी श्रद्धा, परंपरा और विवेक के अनुसार ग्रहण करें। हमारा उद्देश्य केवल जानकारी उपलब्ध कराना है; किसी की धार्मिक भावना को ठेस पहुंचाना नहीं।)



