जीवन की भागदौड़ में परिवार के साथ बिताए गए कुछ पल, अपनों के चेहरे पर मुस्कान और रिश्तों में बना रहने वाला विश्वास ही जीवन को खूबसूरत बनाते हैं। पति-पत्नी का रिश्ता भी केवल साथ रहने का नहीं, बल्कि एक-दूसरे को समझने, सम्मान देने, सुख-दुख में साथ निभाने और हर परिस्थिति में एक-दूसरे का संबल बनने का रिश्ता है। तीज-त्योहार इन्हीं भावनाओं को उत्सव में बदलने के अवसर प्रदान करते हैं। करवा चौथ ऐसा ही एक पर्व है, जब हाथों में मेहंदी सजती है, चूड़ियों की खनक घर-आँगन में खुशियाँ बिखेरती है, महिलाएँ सोलह शृंगार करती हैं और पूरे दिन के व्रत के बाद चाँद के दीदार का इंतजार एक विशेष भावनात्मक अनुभव बन जाता है। इस पर्व से जुड़ी परंपराएँ जहाँ भारतीय संस्कृति की खूबसूरती को दर्शाती हैं, वहीं यह अवसर हमें याद दिलाता है कि रिश्तों की असली मजबूती प्रेम, विश्वास और पारस्परिक सम्मान में होती है। आइए, करवा चौथ के इस खास अवसर पर जानते हैं इस पर्व का महत्व, इससे जुड़ी प्रमुख मान्यताएँ और पूजा का शुभ मुहूर्त।
कब मनाया जाता है करवा चौथ?
करवा चौथ हिंदू पंचांग के अनुसार कार्तिक मास के कृष्ण पक्ष की चतुर्थी तिथि को मनाया जाता है। इस वर्ष 2026 में यह पर्व गुरुवार, 29 अक्टूबर को मनाया जा रहा है। उत्तर भारत के अनेक राज्यों में यह पर्व विशेष उत्साह से मनाया जाता है। विवाहित महिलाएँ पारंपरिक रूप से अपने पति की लंबी आयु, अच्छे स्वास्थ्य और दांपत्य जीवन की सुख-समृद्धि की कामना के लिए व्रत रखती हैं।
करवा चौथ का नाम कैसे पड़ा?
करवा चौथ को करक चतुर्थी के नाम से भी जाना जाता है। ‘करवा’ या ‘करक’ मिट्टी के उस पात्र को कहा जाता है, जिसका उपयोग पूजा में जल रखने और चंद्रमा को अर्घ्य देने के लिए किया जाता है। ‘चौथ’ का संबंध चतुर्थी तिथि से है। इस प्रकार पर्व का नाम ही इसकी परंपरा और पूजा-पद्धति से जुड़ा हुआ है।
पर्व से जुड़ी प्रमुख मान्यताएँ
करवा चौथ से जुड़ी प्रचलित मान्यता है कि व्रत रखने वाली महिलाएँ अपने पति की दीर्घायु, अच्छे स्वास्थ्य और परिवार की खुशहाली के लिए प्रार्थना करती हैं। कई परंपराओं में भगवान शिव, माता पार्वती, भगवान गणेश और करवा माता की पूजा की जाती है। चंद्रमा को अर्घ्य देना और छलनी से चंद्रदर्शन के बाद जीवनसाथी का चेहरा देखना इस पर्व की प्रमुख परंपराओं में शामिल है। विभिन्न क्षेत्रों और परिवारों में पूजा की विधि तथा रीति-रिवाजों में अंतर हो सकता है। ये धार्मिक आस्था और सांस्कृतिक परंपराओं से जुड़ी मान्यताएँ हैं।
सर्गी, मेहंदी और सोलह शृंगार की परंपरा
करवा चौथ की रौनक सुबह से ही दिखाई देने लगती है। कई परिवारों में महिलाएँ सूर्योदय से पहले सर्गी ग्रहण करती हैं। सर्गी में फल, मिठाइयाँ, सूखे मेवे और अन्य खाद्य पदार्थ शामिल किए जाते हैं। अनेक परंपराओं में सास अपनी बहू को सर्गी देती हैं, जो स्नेह और आशीर्वाद का प्रतीक है। इस दिन मेहंदी लगाने, पारंपरिक वस्त्र पहनने, चूड़ियाँ, बिंदी, सिंदूर और आभूषणों से सजने की विशेष परंपरा है। सोलह शृंगार भारतीय संस्कृति में सौंदर्य और सुहाग से जुड़ा माना जाता है। हालाँकि, इसे अपनाने का तरीका हर महिला की अपनी पसंद और पारिवारिक परंपरा के अनुसार अलग हो सकता है।
करवा चौथ की पूजा कैसे की जाती है?
करवा चौथ की पूजा सामान्यतः शाम को की जाती है। महिलाएँ पूजा की थाली सजाकर भगवान शिव, माता पार्वती, भगवान गणेश और करवा माता का स्मरण करती हैं। कई परिवारों में करवा चौथ की कथा सुनी या पढ़ी जाती है तथा पारंपरिक गीतों के साथ पूजा संपन्न होती है। चंद्रमा दिखाई देने पर उसे जल अर्पित किया जाता है। अनेक परिवारों में महिलाएँ छलनी से चंद्रमा और फिर अपने जीवनसाथी का चेहरा देखती हैं। इसके बाद जीवनसाथी के हाथों जल ग्रहण करके व्रत खोलने की परंपरा है। अलग-अलग क्षेत्रों में इन रस्मों के तरीके कुछ भिन्न हो सकते हैं।
करवा चौथ 2026 : शुभ मुहूर्त और चंद्रोदय का समय
छत्तीसगढ़ के भिलाई-दुर्ग क्षेत्र के लिए उपलब्ध पंचांग संबंधी जानकारी के अनुसार आज के प्रमुख समय इस प्रकार बताए गए हैं।
दिनांक: गुरुवार, 29 अक्टूबर 2026
पूजा का शुभ मुहूर्त: शाम 5:30 से 6:46 बजे तक
अनुमानित चंद्रोदय: रात लगभग 8:19 से 8:20 बजे
ये समय भिलाई-दुर्ग क्षेत्र के लिए हैं। चंद्रोदय के समय में स्थानीय परिस्थितियों और पंचांग की गणना के अनुसार थोड़ा अंतर हो सकता है। अन्य शहरों के पाठक अपने स्थानीय पंचांग से समय की पुष्टि करें।
व्रत के दौरान रखें अपना ध्यान
करवा चौथ अनेक महिलाओं के लिए आस्था और भावनाओं से जुड़ा विशेष अवसर है। फिर भी व्रत रखते समय अपने स्वास्थ्य का ध्यान रखना जरूरी है। निर्जला व्रत परंपरा का हिस्सा है, लेकिन यह सभी के लिए सुरक्षित हो, ऐसा आवश्यक नहीं। मधुमेह, गर्भावस्था, किसी अन्य स्वास्थ्य समस्या या नियमित दवा लेने की स्थिति में चिकित्सकीय सलाह को प्राथमिकता दें। अपनी क्षमता और स्वास्थ्य के अनुरूप निर्णय लेना उचित है।
करवा चौथ भारतीय संस्कृति का ऐसा पर्व है, जिसमें परंपरा, शृंगार, आस्था और पारिवारिक भावनाएँ एक साथ दिखाई देती हैं। चाँद के दीदार का इंतजार और जीवनसाथी के साथ व्रत खोलने का क्षण अनेक परिवारों के लिए यादगार बन जाता है। इस पर्व की खूबसूरती तब और बढ़ जाती है, जब प्रेम और विश्वास के साथ एक-दूसरे के स्वास्थ्य, भावनाओं और इच्छाओं का भी सम्मान किया जाए। रिश्तों की मजबूती किसी एक दिन की रस्म में नहीं, बल्कि रोज निभाए जाने वाले सहयोग, भरोसे और सम्मान में होती है।
करवा चौथ का यह पर्व सभी परिवारों के जीवन में प्रेम, खुशियाँ, आपसी समझ और सुख-समृद्धि लेकर आए। सभी को करवा चौथ की हार्दिक शुभकामनाएँ! 🙏🌹
(डिस्क्लेमर: इस लेख में करवा चौथ से संबंधित धार्मिक मान्यताओं, परंपराओं और पूजा-विधि की जानकारी सामान्य जन-जागरूकता के उद्देश्य से प्रस्तुत की गई है। अलग-अलग क्षेत्रों, परिवारों और पंचांगों के अनुसार मान्यताओं, पूजा-पद्धति एवं शुभ मुहूर्त में अंतर हो सकता है। पाठक स्थानीय पंचांग के अनुसार समय की पुष्टि करें तथा व्रत रखते समय अपने स्वास्थ्य और शारीरिक क्षमता का ध्यान रखें। किसी की धार्मिक भावनाओं को ठेस पहुँचाना हमारा उद्देश्य नहीं है।)


