प्रति वर्ष 19 जनवरी को, भारतीय राज्य त्रिपुरा कोकबोरोक भाषा को बढ़ावा देने के लिए कोकबोरोक दिवस मनाता है, जिसे त्रिपुरी भाषा दिवस के रूप में भी जाना जाता है। यह दिन 1979 को सम्मानित करता है जब कोकबोरोक को पहली बार आधिकारिक रूप से मान्यता मिली थी। इस वर्ष कोकबोरोक दिवस की 48वीं वर्षगांठ है, जो त्रिपुरा की प्राचीन भाषा की बहाली की मांग के लिए प्रतिवर्ष मनाया जाता है, जो त्रिपुरा के त्रिपुरी समुदाय के बीच हजारों वर्षों से बोली जाती है।
भारत विविध भाषाओं और संस्कृतियों का देश है, जहाँ प्रत्येक भाषा अपने साथ एक समृद्ध इतिहास, परंपरा और पहचान को समेटे हुए है। इन्हीं भाषाओं में से एक है कोकबोरोक, जो त्रिपुरा राज्य के मूल निवासियों, विशेषकर त्रिपुरी समुदाय की मातृभाषा है। हर वर्ष 19 जनवरी को मनाया जाने वाला कोकबोरोक दिवस न केवल एक भाषा के सम्मान का दिन है, बल्कि यह आदिवासी अस्मिता, सांस्कृतिक संरक्षण और भाषाई अधिकारों की भावना को भी सशक्त करता है। वर्ष 2026 में कोकबोरोक दिवस पूरे उत्साह और जागरूकता के साथ मनाया जाएगा, जिसमें भाषा के इतिहास, महत्व और भविष्य पर विशेष जोर दिया जाएगा।
कोकबोरोक भाषा का इतिहास
कोकबोरोक भाषा का इतिहास अत्यंत प्राचीन और गौरवशाली रहा है। यह भाषा तिब्बती-बर्मी भाषा परिवार से संबंधित मानी जाती है और मुख्य रूप से त्रिपुरा के त्रिपुरी, रियांग, जमातिया, नोआतिया, उचई और अन्य जनजातीय समुदायों द्वारा बोली जाती है। इतिहासकारों के अनुसार, कोकबोरोक भाषा का उपयोग त्रिपुरा के राजवंश काल से ही होता आ रहा है। माना जाता है कि माणिक्य वंश के शासकों के शासनकाल में यह भाषा प्रशासनिक और सामाजिक जीवन का महत्वपूर्ण माध्यम रही। कोकबोरोक का उल्लेख “राजमाला” जैसे ऐतिहासिक ग्रंथों में भी मिलता है, जो त्रिपुरा के राजाओं का इतिहास प्रस्तुत करता है। समय के साथ-साथ बाहरी प्रभावों के कारण भाषा में उतार-चढ़ाव आए, किंतु जनजातीय समाज ने इसे अपनी सांस्कृतिक पहचान के रूप में संरक्षित रखा।
कोकबोरोक दिवस की शुरुआत
कोकबोरोक दिवस मनाने की परंपरा 19 जनवरी 1979 से प्रारंभ हुई, जब कोकबोरोक को त्रिपुरा में औपचारिक रूप से मान्यता दिलाने की दिशा में एक महत्वपूर्ण आंदोलन शुरू हुआ। इस दिन को इसलिए चुना गया क्योंकि इसी तिथि को भाषा संरक्षण और अधिकारों को लेकर ऐतिहासिक निर्णय और जनआंदोलन की नींव पड़ी थी। इसके बाद कोकबोरोक को त्रिपुरा बोर्ड ऑफ सेकेंडरी एजुकेशन के पाठ्यक्रम में शामिल किया गया और धीरे-धीरे यह शिक्षा, साहित्य और सांस्कृतिक कार्यक्रमों का अभिन्न हिस्सा बन गई।
कोकबोरोक दिवस का महत्व
कोकबोरोक दिवस केवल एक स्मरण दिवस नहीं, बल्कि भविष्य की दिशा तय करने का अवसर है। वर्तमान समय में जब वैश्वीकरण और आधुनिकता के कारण कई स्थानीय भाषाएँ विलुप्त होने के कगार पर हैं, तब कोकबोरोक दिवस भाषा संरक्षण के प्रति नई ऊर्जा प्रदान करता है।
इस दिन का महत्व निम्नलिखित बिंदुओं में देखा जा सकता है:
* मातृभाषा के प्रति गर्व और सम्मान की भावना का विकास
* आदिवासी युवाओं को अपनी भाषा सीखने और प्रयोग करने के लिए प्रेरणा
* कोकबोरोक साहित्य, लोककला और लोकगीतों को प्रोत्साहन
* भाषाई अधिकारों और संवैधानिक मान्यता की मांग को सशक्त बनाना
कोकबोरोक दिवस का उद्देश्य
कोकबोरोक दिवस मनाने के पीछे कई महत्वपूर्ण उद्देश्य हैं, जिनमें प्रमुख हैं:
भाषा संरक्षण – कोकबोरोक भाषा को लुप्त होने से बचाना और इसके शुद्ध रूप को संरक्षित करना।
शिक्षा में विस्तार – विद्यालयों, महाविद्यालयों और विश्वविद्यालयों में कोकबोरोक भाषा के अध्ययन को बढ़ावा देना।
साहित्यिक विकास – कोकबोरोक में साहित्य, कविता, नाटक और शोध कार्यों को प्रोत्साहित करना।
सांस्कृतिक जागरूकता – समाज को यह समझाना कि भाषा केवल संवाद का माध्यम नहीं, बल्कि संस्कृति की आत्मा होती है।
युवाओं की भागीदारी – नई पीढ़ी को अपनी जड़ों से जोड़ना और भाषा को आधुनिक माध्यमों से जोड़ना।
कोकबोरोक दिवस 2026 की थीम (संभावित)
प्रत्येक वर्ष की तरह 2026 में भी कोकबोरोक दिवस को एक विशेष विषय के साथ मनाया जा सकता है, जैसे –
“मातृभाषा से आत्मनिर्भरता की ओर” या “कोकबोरोक: संस्कृति, शिक्षा और भविष्य”। यह विषय भाषा को केवल परंपरा तक सीमित न रखकर आधुनिक शिक्षा, तकनीक और रोजगार से जोड़ने पर बल देता है।
कोकबोरोक भाषा का सामाजिक और सांस्कृतिक महत्व
कोकबोरोक भाषा त्रिपुरा की जनजातीय संस्कृति की आत्मा मानी जाती है। लोकगीत, लोकनृत्य, पारंपरिक कथाएँ, विवाह गीत, पर्व-त्योहार सभी में कोकबोरोक भाषा की झलक स्पष्ट रूप से दिखाई देती है। गोरिया पूजा, केर पूजा और खारची पूजा जैसे पारंपरिक आयोजनों में कोकबोरोक भाषा का विशेष प्रयोग होता है। इसके माध्यम से पीढ़ी-दर-पीढ़ी सांस्कृतिक ज्ञान का हस्तांतरण होता है।
कोकबोरोक दिवस 2026 पर होने वाले कार्यक्रम
कोकबोरोक दिवस 2026 के अवसर पर त्रिपुरा सहित देश के विभिन्न हिस्सों में कई कार्यक्रम आयोजित किए जाएंगे, जिनमें शामिल हैं:
* भाषा संगोष्ठी और सेमिनार
* कोकबोरोक कविता और कहानी पाठ
* पारंपरिक नृत्य एवं संगीत कार्यक्रम
* भाषाई अधिकारों पर परिचर्चा
* विद्यालयों और कॉलेजों में विशेष प्रतियोगिताएँ
* डिजिटल प्लेटफॉर्म पर वेबिनार और ऑनलाइन अभियान
इन आयोजनों का मुख्य उद्देश्य समाज के हर वर्ग तक कोकबोरोक भाषा की महत्ता को पहुँचाना होगा।
चुनौतियाँ और भविष्य की दिशा
हालाँकि कोकबोरोक भाषा को लेकर जागरूकता बढ़ी है, फिर भी कई चुनौतियाँ मौजूद हैं। जैसे –
* शहरीकरण के कारण भाषा का सीमित प्रयोग
* अंग्रेज़ी और अन्य भाषाओं का बढ़ता प्रभाव
* पर्याप्त शिक्षण सामग्री और प्रशिक्षित शिक्षकों की कमी
कोकबोरोक दिवस 2026 इन चुनौतियों पर मंथन करने और समाधान खोजने का अवसर प्रदान करता है। डिजिटल तकनीक, मोबाइल ऐप, ऑनलाइन पाठ्यक्रम और सोशल मीडिया के माध्यम से भाषा को नई पीढ़ी से जोड़ा जा सकता है।
कोकबोरोक दिवस 2026 केवल एक दिवस नहीं, बल्कि एक आंदोलन, एक चेतना और एक संकल्प है। अपनी भाषा, संस्कृति और पहचान को बचाने का। यह दिन हमें याद दिलाता है कि मातृभाषा में सोचने, बोलने और लिखने से ही समाज की जड़ें मजबूत होती हैं। यदि कोकबोरोक भाषा को शिक्षा, प्रशासन और तकनीक से जोड़ा जाए, तो यह न केवल जीवित रहेगी, बल्कि आने वाली पीढ़ियों के लिए गौरव का विषय बनेगी। कोकबोरोक दिवस 2026 इसी आशा और विश्वास के साथ मनाया जाएगा कि भाषा के साथ-साथ एक संपूर्ण संस्कृति भी सुरक्षित और समृद्ध होगी।



