कैंडी की दुनिया छोटी जरूर दिखाई देती है, लेकिन इसका इतिहास बहुत लंबा और दिलचस्प है। प्राचीन भारत में गन्ने के रस से तैयार किए गए चीनी के टुकड़ों से लेकर आज की रंग-बिरंगी आधुनिक कैंडी तक का सफर मानव की खोज, रचनात्मकता और स्वाद के प्रति प्रेम की कहानी कहता है। आज कैंडी दिवस के अवसर पर अपनी पसंदीदा कैंडी को याद कीजिए। हो सकता है किसी को संतरे वाली गोली याद आए, किसी को इमली की कैंडी और किसी को बचपन में चॉकलेट पाने की खुशी। स्वाद बदल सकते हैं, लेकिन उनसे जुड़ी यादें अक्सर जीवन भर साथ रहती हैं।
बचपन की यादों का पिटारा खोलें तो उसमें खिलौनों, दोस्तों, स्कूल और खेलकूद के साथ एक छोटी-सी मीठी चीज जरूर मिल जाएगी, जिसे देखते ही चेहरे पर मुस्कान आ जाती है। कभी जेब खर्च के बचे हुए सिक्कों से खरीदी गई संतरे वाली गोली, कभी स्कूल के बाहर मिलने वाली इमली की खट्टी-मीठी कैंडी, तो कभी रंग-बिरंगी टॉफियों के लिए दोस्तों से की गई छोटी-सी जिद! कैंडी का रिश्ता केवल स्वाद से नहीं, बल्कि बचपन की मासूम खुशियों से भी जुड़ा है। दिलचस्प बात यह है कि उम्र चाहे कितनी भी बढ़ जाए, पसंदीदा कैंडी देखकर मन कुछ पल के लिए फिर बच्चा बन जाता है। तो आइए, आज मिठास की इसी छोटी-सी दुनिया में चलते हैं और जानते हैं कि आखिर कैंडी का इतिहास कितना पुराना है और इसकी कहानी भारत से कैसे जुड़ती है।
कब और क्यों मनाया जाता है कैंडी दिवस?
हर वर्ष 4 नवंबर को अमेरिका में नेशनल कैंडी डे यानी राष्ट्रीय कैंडी दिवस मनाया जाता है। यह कोई सरकारी अवकाश या संयुक्त राष्ट्र द्वारा घोषित आधिकारिक अंतरराष्ट्रीय दिवस नहीं, बल्कि मिठाइयों और कैंडी के प्रति लोगों के लगाव को दर्शाने वाला एक अनौपचारिक अवसर है।
इस दिन का उद्देश्य कैंडी की दुनिया, उससे जुड़े इतिहास, स्वाद और परंपराओं को याद करना तथा लोगों के बीच खुशियां बांटने के छोटे-छोटे बहाने तलाशना है। कैंडी बनाने वाले उद्योग और इससे जुड़ी रचनात्मकता को भी इस अवसर पर पहचान मिलती है।
कैंडी की शुरुआत आखिर कहां से हुई?
कैंडी का इतिहास केवल आधुनिक कारखानों और रंगीन पैकेटों से शुरू नहीं होता। इसकी जड़ें हजारों साल पुरानी मिठास की परंपरा में छिपी हैं। प्राचीन समय में जब चीनी का व्यापक उपयोग नहीं होता था, तब लोग शहद से फलों, मेवों और फूलों को मीठा बनाकर खाते थे। लेकिन गन्ने के रस से चीनी के क्रिस्टल तैयार करने की तकनीक ने मिठास की दुनिया बदल दी। इस क्षेत्र में प्राचीन भारत का महत्वपूर्ण योगदान माना जाता है। यहां गन्ने के रस को उबालकर और विशेष प्रक्रिया से ठंडा करके चीनी के ठोस कण तथा खंड तैयार किए जाते थे। बाद में यह तकनीक और चीनी का ज्ञान व्यापारिक मार्गों से फारस, अरब और यूरोप तक पहुंचा। इस तरह आज जिस कैंडी को हम दुनिया भर में पहचानते हैं, उसकी ऐतिहासिक कहानी में भारत की भी महत्वपूर्ण भूमिका रही है।
कैंडी नाम कैसे पड़ा?
कैंडी शब्द की कहानी भी कम दिलचस्प नहीं है। माना जाता है कि अंग्रेजी का Candy शब्द संस्कृत के ‘खंड’ या ‘खण्ड’ से जुड़ा है। इसका अर्थ होता है टुकड़ा या टूटा हुआ हिस्सा। प्राचीन भारत में चीनी के ठोस टुकड़ों के लिए इस शब्द का प्रयोग होता था। समय के साथ यह शब्द फारसी के ‘कंद’, अरबी के ‘कांदी’ और फ्रांसीसी भाषा के ‘सुक्र कंदी’ जैसे रूपों से गुजरता हुआ अंग्रेजी के Candy शब्द तक पहुंचा। यानी जिस शब्द का इस्तेमाल आज दुनिया भर में मीठी गोलियों और टॉफियों के लिए होता है, उसकी भाषाई जड़ें भारतीय परंपरा से जुड़ी हुई हैं।
मिश्री से लेकर रंगीन कैंडी तक का सफर
कैंडी की दुनिया समय के साथ लगातार बदलती रही है। कभी मिश्री और शक्कर के छोटे-छोटे टुकड़े मिठास का प्रमुख साधन थे। फिर धीरे-धीरे चीनी को अलग-अलग आकार देकर उसमें स्वाद और रंग मिलाने की कला विकसित हुई।आज बाजार में कैंडी की इतनी किस्में हैं कि उनके नाम गिनना भी मुश्किल हो जाए। संतरे, आम, इमली, पुदीना, स्ट्रॉबेरी और नींबू के स्वाद वाली गोलियां हों या दूध, कारमेल, चॉकलेट और जेली से बनी कैंडी, हर किसी की अपनी पसंद है।लॉलीपॉप, टॉफी, हार्ड कैंडी, चॉकलेट कैंडी, जेली कैंडी और सॉफ्ट कैंडी इसी बदलती दुनिया के अलग-अलग रूप हैं। अब कैंडी केवल मिठास नहीं, बल्कि स्वाद, रंग, आकार और कल्पनाशीलता का भी संगम बन चुकी है।
भारत के बचपन वाली कैंडी की बात ही अलग है!
भारत में कैंडी का मतलब हमेशा महंगे ब्रांड या आकर्षक पैकेट नहीं रहा। हमारे बचपन की असली मिठास तो उन छोटी-छोटी गोलियों में छिपी थी, जो स्कूल के बाहर, मोहल्ले की दुकानों और मेलों में मिलती थीं। याद कीजिए संतरे वाली गोली, इमली की खट्टी-मीठी कैंडी, आम पापड़, आंवले की गोली, दूध की टॉफी और रंगीन मीठी गोलियां! कई बार तो एक-दो रुपये में मिलने वाली मिठाई भी पूरे दिन की खुशी बन जाती थी। दोस्तों के बीच कैंडी बांटना, अपनी पसंद की गोली बचाकर रखना और किसी खास स्वाद के लिए दुकान पर बार-बार पहुंचना भी बचपन के छोटे-छोटे किस्सों का हिस्सा रहा है। आज भले ही कैंडी के पैकेट और कीमतें बदल गई हों, लेकिन बचपन की उन छोटी दुकानों और मीठी यादों का आकर्षण आज भी बरकरार है।
कैंडी की दुनिया के कुछ मजेदार तथ्य
* कैंडी का हर रूप मीठा ही नहीं होता। इमली और नींबू जैसी खट्टी कैंडी भी खूब लोकप्रिय हैं।
* लॉलीपॉप में कैंडी को एक डंडी पर लगाया जाता है, ताकि उसे बिना हाथ गंदे किए आसानी से खाया जा सके।
* रॉक कैंडी या मिश्री बनाने में चीनी के क्रिस्टल को धीरे-धीरे बड़ा होने दिया जाता है। इसे देखकर ऐसा लगता है जैसे कोई मीठा पत्थर तैयार हो गया हो।
* दुनिया के कई देशों में कैंडी के अलग-अलग स्वाद और आकार लोकप्रिय हैं। कहीं खट्टी कैंडी पसंद की जाती है तो कहीं चॉकलेट और कारमेल का चलन अधिक है।
* कैंडी केवल बच्चों की पसंद नहीं है। बड़े लोग भी इसे खाते हैं और कई बार अपनी पसंदीदा कैंडी को देखकर पुराने दिनों में लौट जाते हैं।
कैंडी और खुशियों का छोटा-सा रिश्ता
कैंडी की सबसे खास बात यह है कि इसे खुशी से जोड़ने के लिए किसी बड़े अवसर की जरूरत नहीं होती। जन्मदिन पर बच्चों को बांटी जाने वाली टॉफियां, त्योहारों पर मिठाइयों के साथ मिलने वाली छोटी कैंडी या किसी बच्चे को चुप कराने के लिए दी गई एक गोली, ये सभी छोटे-छोटे पल हैं।कई बार किसी बच्चे के हाथ में एक कैंडी थमा देना उसके लिए बहुत बड़ी खुशी बन जाता है। यही कारण है कि कैंडी केवल खाने की चीज नहीं, बल्कि प्यार बांटने और छोटी खुशियों को साझा करने का एक माध्यम भी बन गई है।
मिठास के साथ थोड़ी सावधानी भी जरूरी
कैंडी का स्वाद भले ही कितना भी अच्छा क्यों न हो, लेकिन इसमें मौजूद चीनी की मात्रा को नजरअंदाज नहीं करना चाहिए। अधिक मात्रा में मीठी चीजें खाने से दांतों में कैविटी और अन्य स्वास्थ्य संबंधी परेशानियों का खतरा बढ़ सकता है।विशेषकर बच्चों को कैंडी सीमित मात्रा में देने, नियमित रूप से दांत साफ करने और संतुलित खानपान की आदत डालने पर ध्यान देना चाहिए। मिठास का आनंद तभी अच्छा है, जब उसके साथ सेहत का भी ख्याल रखा जाए।
खुशियां हमेशा बड़ी चीजों में नहीं छिपी होतीं। कभी-कभी बचपन की एक छोटी-सी कैंडी भी चेहरे पर बड़ी मुस्कान ले आती है। इसलिए जीवन की भागदौड़ में छोटी-छोटी खुशियों का स्वाद लेना कभी न भूलें।
(डिस्क्लेमर: यह लेख सामान्य जानकारी, ऐतिहासिक तथ्यों और मनोरंजन के उद्देश्य से तैयार किया गया है। कैंडी का सेवन सीमित मात्रा में करना चाहिए तथा बच्चों के खानपान और दांतों की स्वच्छता का विशेष ध्यान रखना चाहिए।)


