घर सिर्फ रहने की जगह नहीं, जिंदगी का सबसे बड़ा सपना होता है, घर सिर्फ चार दीवारें नहीं, रिश्तों और जिम्मेदारियों का भी नाम है।
दुनिया के किसी हिस्से में जब युद्ध छिड़ता है और लोग अपना घर छोड़कर सुरक्षित जगह की तलाश में निकलने को मजबूर होते हैं, तब “घर” शब्द का असली अर्थ शायद सबसे ज्यादा समझ में आता है। जिस घर में किसी परिवार ने वर्षों बिताए, जहां बच्चों ने पहला कदम रखा, जहां किसी मां ने अपने बच्चे को सुरक्षित महसूस कराया और जहां परिवार की यादें दीवारों में बस गईं—वही घर एक दिन पीछे छूट जाता है। युद्ध और हिंसा से विस्थापित लोग कई बार अस्थायी शिविरों या शेल्टर होम में ऐसी परिस्थितियों में रहने को मजबूर होते हैं, जहां निजता, सुविधा, सुरक्षा और अपनेपन की कमी उनके जीवन को और कठिन बना देती है। तब समझ आता है कि आवास केवल सिर छिपाने की जगह नहीं, बल्कि सुरक्षा, सम्मान, निजता और सामान्य जीवन की बुनियादी जरूरत है। लेकिन हमारे लिए भी घर केवल ईंट, सीमेंट और छत का नाम नहीं है। शायद ही कोई व्यक्ति ऐसा हो जिसने जीवन में कभी अपने सपनों के घर की कल्पना न की हो। कोई अपनी छोटी-सी झोपड़ी को पक्का घर बनाने के लिए वर्षों मेहनत करता है, कोई नौकरी की कमाई से एक-एक पैसा जोड़ता है, कोई जमीन खरीदकर धीरे-धीरे घर बनाता है। उस घर की हर ईंट में किसी की मेहनत, किसी का त्याग और किसी परिवार के भविष्य का सपना जुड़ा होता है। लेकिन यहीं एक सवाल हमें भीतर तक झकझोरता है, जिस घर को बनाने में पूरी जिंदगी लग जाती है, उसी घर और पुश्तैनी संपत्ति के लिए कभी-कभी बचपन से साथ पले-बढ़े भाई-बहन बड़े होकर एक-दूसरे के दुश्मन क्यों बन जाते हैं?जिस आंगन में साथ खेला गया, जिस छत के नीचे बचपन बीता, जिस घर ने कई पीढ़ियों को एक साथ देखा, वही घर अगर रिश्तों में दरार का कारण बन जाए तो क्या वह सचमुच घर रह जाता है? क्योंकि परिवार में प्रेम न हो तो महल भी वीरान लग सकता है और प्रेम हो तो सीमित साधनों वाला छोटा-सा घर भी दुनिया की सबसे सुरक्षित जगह बन सकता है।यही वजह है कि आवास की बात केवल मकानों की संख्या, जमीन की कीमत या शहरों में बढ़ती इमारतों तक सीमित नहीं होनी चाहिए। घर एक जरूरत है, लेकिन उससे कहीं बढ़कर एक सपना है। यह सुरक्षा है, अपनापन है, परिवार की स्मृतियों का ठिकाना है और कई बार पीढ़ी-दर-पीढ़ी चली आ रही परंपरा का हिस्सा भी है। विश्व हैबिटेट दिवस हमें इसी व्यापक अर्थ में “आवास” को समझने का अवसर देता है, ऐसा आवास जहां इंसान केवल रह न रहा हो, बल्कि सुरक्षित, सम्मानजनक और अपनेपन से भरा जीवन जी रहा हो।और शायद हमें यह भी याद रखना चाहिए कि घर की असली खूबसूरती उसकी दीवारों, कमरों या उसकी कीमत में नहीं होती। उसकी असली खूबसूरती इस बात में होती है कि उस घर में रहने वाले लोग एक-दूसरे के लिए कितनी जगह अपने दिल में बचाकर रखते हैं।
हम अक्सर कहते हैं, “हर व्यक्ति के सिर पर अपनी छत होनी चाहिए।” यह बात बिल्कुल सही है। लेकिन क्या केवल सिर पर छत होना ही पर्याप्त है? क्या सुरक्षित, स्वच्छ और सम्मानजनक जीवन के लिए मकान के साथ पानी, बिजली, स्वच्छता, सुरक्षा, आसपास का वातावरण और अपनों का साथ भी जरूरी नहीं है? इन्हीं सवालों को दुनिया के सामने रखने का अवसर है विश्व हैबिटेट दिवस, जो हर वर्ष अक्टूबर के पहले सोमवार को मनाया जाता है। वर्ष 2026 में यह दिवस 5 अक्टूबर को मनाया जाएगा और इसकी थीम है “Adequate Housing for All” — “सभी के लिए पर्याप्त आवास”। संयुक्त राष्ट्र के अनुसार पर्याप्त आवास केवल रहने की जगह नहीं, बल्कि मानव गरिमा, सुरक्षा और कल्याण से जुड़ा मूल आधार है। इस वर्ष विश्व हैबिटेट दिवस हमें एक बहुत जरूरी सवाल के सामने खड़ा करता है, क्या हम केवल ज्यादा से ज्यादा मकान बनाने की कोशिश करें या ऐसा समाज भी बनाएं, जहां उपलब्ध आवास, संसाधन और पारिवारिक रिश्तों का बेहतर उपयोग हो?
विश्व हैबिटेट दिवस की शुरुआत क्यों हुई?
संयुक्त राष्ट्र ने 1985 में अक्टूबर के पहले सोमवार को विश्व हैबिटेट दिवस के रूप में मनाने का निर्णय लिया। इसका उद्देश्य दुनिया को यह याद दिलाना था कि हमारे शहरों, कस्बों और मानव बस्तियों का भविष्य हमारी सामूहिक जिम्मेदारी है और प्रत्येक व्यक्ति को पर्याप्त आवास का अधिकार मिलना चाहिए। पहला विश्व हैबिटेट दिवस 1986 में नैरोबी में मनाया गया था और उसकी थीम थी—“Shelter is my right” यानी “आश्रय मेरा अधिकार है।” आज यह मुद्दा और गंभीर हो गया है। संयुक्त राष्ट्र के अनुसार दुनिया में 3 अरब से अधिक लोग पर्याप्त आवास से वंचित हैं, जबकि 1.1 अरब से अधिक लोग अनौपचारिक बस्तियों में रहते हैं और करोड़ों लोग बेघर हैं। संघर्ष, प्राकृतिक आपदाएं, जलवायु परिवर्तन और आर्थिक कठिनाइयां इस समस्या को और बढ़ा रही हैं। इसलिए “सभी के लिए पर्याप्त आवास” केवल एक सरकारी योजना या मकान बनाने का लक्ष्य नहीं है। यह एक ऐसे समाज की कल्पना है जिसमें कोई व्यक्ति असुरक्षित, अस्वच्छ या अमानवीय परिस्थितियों में रहने को मजबूर न हो।
मकान और आवास में फर्क समझना जरूरी है
हमारे लिए मकान अक्सर ईंट, सीमेंट, लोहे और छत से बनी एक संरचना है। लेकिन आवास इससे कहीं बड़ा विचार है। एक अच्छा आवास वह है जहां परिवार सुरक्षित रह सके, बच्चों को पढ़ने का वातावरण मिले, बुजुर्ग सम्मान के साथ रह सकें, महिलाओं को सुरक्षा मिले, स्वच्छ पानी और शौचालय जैसी मूल सुविधाएं उपलब्ध हों और आसपास का वातावरण भी रहने योग्य हो। इसीलिए किसी बड़े शहर में बना महंगा फ्लैट भी “पर्याप्त आवास” की कसौटी पर तब तक पूरा नहीं उतरता, जब तक वहां रहने वाले लोगों की मूल जरूरतें और सुरक्षा सुनिश्चित न हों।विश्व हैबिटेट दिवस का संदेश यही है कि हर व्यक्ति को केवल रहने के लिए जगह नहीं, बल्कि सम्मानजनक जीवन जीने योग्य आवास चाहिए।
लेकिन एक सवाल हमारे अपने घरों से भी जुड़ा है
जब हम विश्व स्तर पर आवास की समस्या की बात करते हैं, तो सरकारों, नगर नियोजन, जमीन की कीमत, तेजी से बढ़ते शहरों और बढ़ती आबादी की चर्चा स्वाभाविक है। लेकिन क्या इस पूरी चर्चा में हमें अपने परिवार के बदलते स्वरूप पर भी एक बार विचार नहीं करना चाहिए? आज अधिकांश शहरों में न्यूक्लियर फैमिली यानी छोटे परिवार सामान्य होते जा रहे हैं। इसके पीछे अनेक व्यावहारिक कारण हैं, जैसे रोजगार, शिक्षा, निजी स्वतंत्रता, जीवनशैली और बदलती सामाजिक परिस्थितियां। इसलिए न्यूक्लियर फैमिली को गलत या बुरा कहना न तो उचित है और न ही हमारा उद्देश्य। लेकिन जरा कुछ दशक पीछे चलकर देखिए। हमारे समाज में बड़ी संख्या में परिवार ऐसे थे जहां दादा-दादी, माता-पिता, चाचा-चाची और बच्चे, तीन या चार पीढ़ियों तक के लोग एक ही घर में रहते थे। वह घर शायद आज के कई आधुनिक मकानों जितना बड़ा नहीं था, लेकिन उसमें लोगों के लिए जगह के साथ-साथ रिश्तों में भी जगह थी। बच्चे दादा-दादी के पास बड़े होते थे। भाई-भाई के परिवार एक-दूसरे की मदद करते थे। किसी के बीमार पड़ने पर दूसरा उसके साथ खड़ा होता था। आर्थिक परेशानी आई तो परिवार सहारा बनता था। किसी बच्चे की पढ़ाई, किसी बुजुर्ग की देखभाल या किसी संकट की घड़ी, जिम्मेदारी केवल एक व्यक्ति की नहीं होती थी। यह व्यवस्था हर जगह आदर्श रही हो, ऐसा कहना भी सही नहीं होगा। संयुक्त परिवारों में अपने संघर्ष और मतभेद भी रहे होंगे। लेकिन आपसी सहयोग और साझा जिम्मेदारी की भावना निश्चित रूप से उसकी बड़ी ताकत थी।
क्या परिवार के छोटे होने का असर आवास पर भी पड़ता है?
यह सवाल विचार करने लायक है। मान लीजिए किसी परिवार में चार बच्चे हैं। समय के साथ चारों की अपनी-अपनी गृहस्थी बनती है और चारों परिवारों को अलग-अलग मकान चाहिए। अगली पीढ़ी में यही प्रक्रिया आगे बढ़ सकती है। इसका अर्थ यह नहीं कि किसी व्यक्ति को अपना स्वतंत्र घर नहीं मिलना चाहिए। स्वतंत्र जीवन का अपना महत्व है। लेकिन जब हर नई पारिवारिक इकाई के लिए अलग आवास की जरूरत पैदा होती जाती है, तो स्वाभाविक रूप से जमीन, मकान और शहरी संसाधनों पर दबाव भी बढ़ता है।इसके विपरीत, कभी एक ही घर में परिवार की कई इकाइयां साथ रहती थीं। सीमित भूमि और संसाधनों में भी कई लोगों का जीवन एक ही आवासीय इकाई में संभव था। तो क्या आवास की समस्या का समाधान केवल नए-नए मकान बनाते जाना है? या हमें यह भी सोचना चाहिए कि हम अपने पारिवारिक जीवन को किस तरह व्यवस्थित कर रहे हैं? यह किसी निष्कर्ष को थोपने का सवाल नहीं है। यह केवल सोचने का सवाल है। शायद हमें संयुक्त परिवार की पूरी व्यवस्था नहीं, उसकी भावना वापस लानी है। समय बदल चुका है। आज हर परिवार का संयुक्त परिवार में रहना संभव नहीं है। रोजगार और शिक्षा के लिए लोगों को अलग-अलग शहरों में जाना पड़ता है। कई बार छोटे परिवार में रहना व्यावहारिक जरूरत भी है। लेकिन क्या अलग-अलग घरों में रहने का अर्थ यह भी हो कि रिश्ते अलग हो जाएं?
शायद नहीं।
आज जरूरत इस बात की है कि हम संयुक्त परिवार की उस भावना को नए रूप में जीवित रखें जिसमें :—
मुसीबत में अपना साथ छोड़ता नहीं,
बुजुर्ग बोझ नहीं बल्कि परिवार का अनुभव माने जाते हैं, भाई-बहन केवल संपत्ति के हिस्सेदार नहीं बल्कि जीवन के साथी बने रहते हैं, और जरूरत पड़ने पर परिवार का कोई सदस्य अकेला न महसूस करे। हो सकता है घर अलग हों, शहर अलग हों, जीवनशैली अलग हो, लेकिन एक-दूसरे के लिए जगह दिल में बनी रहनी चाहिए। और यही शायद भविष्य के आवास संकट पर भी एक अलग दृष्टिकोण दे सकता है।पुश्तैनी संपत्ति, घर जो जोड़ना था, कहीं वही बांटने का कारण न बन जाए संयुक्त परिवार से अलग होने के बाद एक दूसरी समस्या भी हमारे सामने आती है, पुश्तैनी संपत्ति।
कभी जिस घर में कई पीढ़ियां साथ रहती थीं, वही घर अगली पीढ़ियों में हिस्सों, सीमाओं और विवादों का कारण बन जाता है। सवाल केवल जमीन या मकान का नहीं है। सवाल यह है कि क्या संपत्ति रिश्तों से बड़ी हो गई है? कई बार एक मकान का बंटवारा कागज पर आसान होता है, लेकिन रिश्तों का बंटवारा जीवन भर का दर्द बन सकता है। इसलिए संपत्ति का न्यायपूर्ण बंटवारा जरूरी है, लेकिन उससे भी ज्यादा जरूरी है कि संपत्ति के कारण परिवार का बंटवारा न हो। अगर परिवार अलग-अलग घरों में रहने का निर्णय ले भी, तो यह निर्णय दूरी का कारण नहीं, केवल रहने की व्यवस्था का परिवर्तन होना चाहिए।
शहर बढ़ रहे हैं, लेकिन क्या वे रहने लायक भी बन रहे हैं?
आज दुनिया तेजी से शहरीकरण की ओर बढ़ रही है। शहरों में रोजगार और सुविधाओं की तलाश में लोगों की संख्या बढ़ रही है। इसके साथ जमीन महंगी होती है, मकान महंगे होते हैं और गरीब तथा निम्न आय वर्ग के लिए सुरक्षित आवास हासिल करना कठिन होता जाता है।इसीलिए भविष्य के शहरों की योजना केवल ऊंची इमारतों के आधार पर नहीं हो सकती। हमें ऐसे शहर चाहिए जहां :—
* किफायती आवास उपलब्ध हों,
* गरीब और मध्यम वर्ग के लिए भी जगह हो,
* पानी और स्वच्छता की पर्याप्त व्यवस्था हो,
* सार्वजनिक परिवहन उपलब्ध हो,
* बच्चों के लिए सुरक्षित स्थान हों,
* बुजुर्ग और दिव्यांग भी आसानी से आ-जा सकें,
* हरियाली और खुले स्थान बचें,
और प्राकृतिक आपदाओं तथा जलवायु परिवर्तन के खतरे से निपटने की क्षमता हो। संयुक्त राष्ट्र भी 2026 की थीम के तहत सुरक्षित, किफायती, सुलभ और पर्याप्त आवास के साथ बेहतर नियोजन, सुरक्षित भूमि अधिकार और पर्यावरणीय रूप से टिकाऊ आवास पर जोर दे रहा है।
इंसान का भी घर है और प्रकृति का भी
हैबिटेट यानी पर्यावास का अर्थ केवल इंसानों के घरों तक सीमित नहीं है। जंगल किसी वन्यजीव का घर है। तालाब अनेक जीवों का घर है। नदी केवल पानी की धारा नहीं, बल्कि असंख्य जीवों का जीवन-आधार है। पेड़ केवल लकड़ी या छाया का साधन नहीं, बल्कि पक्षियों और छोटे जीवों का आश्रय हैं। जब हम विकास के नाम पर प्राकृतिक आवासों को लगातार नष्ट करते हैं, तो केवल पशु-पक्षी ही प्रभावित नहीं होते। इसका असर पानी, मौसम, जैव विविधता और अंततः हमारे अपने जीवन पर भी पड़ता है। इसलिए “सभी के लिए पर्याप्त आवास” की भावना में प्रकृति के दूसरे जीवों के पर्यावास को भी समझना जरूरी है। कल, 4 अक्टूबर को विश्व पशु दिवस पर हम इसी पक्ष को विस्तार से समझेंगे। इसलिए आज के लेख में इतना ही कहना पर्याप्त है कि जिस तरह मनुष्य को सुरक्षित घर चाहिए, उसी तरह प्रकृति के हर जीव को भी अपना सुरक्षित पर्यावास चाहिए।
विकास का अर्थ सिर्फ ज्यादा मकान नहीं
हमें एक बात स्वीकार करनी होगी, आवास की समस्या का समाधान केवल जमीन पर अधिक निर्माण कर देने से नहीं होगा। अगर शहरों में लाखों नए मकान बन जाएं लेकिन पानी, सड़क, सीवर, स्कूल, अस्पताल, परिवहन और हरियाली का इंतजाम न हो, तो हम केवल मकान बनाएंगे, बेहतर आवास नहीं। और यदि हम लगातार नए मकान बनाते जाएं लेकिन परिवारों और समाज के बीच सहयोग की भावना कमजोर होती जाए, तो हमारे पास रहने की जगह तो बढ़ सकती है, लेकिन साथ रहने की क्षमता घट सकती है। इसलिए भविष्य की योजना में दो चीजें साथ-साथ चलनी चाहिए, बेहतर आवास और बेहतर रिश्ते।
विश्व हैबिटेट दिवस हमें क्या संकल्प देता है?
# इस दिन सरकारों की जिम्मेदारी है कि गरीब, कमजोर और बेघर लोगों के लिए सुरक्षित और किफायती आवास की दिशा में काम करें।
# शहरों की जिम्मेदारी है कि विकास के साथ पर्यावरण और बुनियादी सुविधाओं का ध्यान रखें।
# समाज की जिम्मेदारी है कि वह किसी व्यक्ति को केवल इसलिए उपेक्षित न करे क्योंकि उसके पास बड़ा या सुंदर घर नहीं है।
और हमारी व्यक्तिगत जिम्मेदारी है कि हम अपने घर को केवल संपत्ति न समझें। घर वह स्थान है जहां किसी बच्चे को सुरक्षा मिलती है, किसी बुजुर्ग को सम्मान मिलता है, किसी बीमार व्यक्ति को सहारा मिलता है और किसी परेशान व्यक्ति को यह भरोसा मिलता है कि “मैं अकेला नहीं हूं।”
मकान कम पड़ सकते हैं, लेकिन रिश्तों में जगह कम नहीं पड़नी चाहिए
विश्व हैबिटेट दिवस हमें दुनिया की आवास समस्या के बारे में सोचने का अवसर देता है। लेकिन शायद इस दिन हमें अपने घर के दरवाजे के भीतर भी एक बार देखना चाहिए। क्या हमारे पास रहने के लिए पर्याप्त जगह है? और उससे भी बड़ा सवाल, क्या हमारे जीवन में अपनों के लिए पर्याप्त जगह है? हो सकता है आने वाले वर्षों में बढ़ती आबादी, शहरीकरण और बदलती जीवनशैली के कारण आवास की जरूरत और बढ़े। हो सकता है हर परिवार का अलग घर होना भविष्य की सामान्य व्यवस्था बन जाए। लेकिन हमें यह भी सोचना होगा कि क्या हर पीढ़ी के लिए अलग घर बनाना ही एकमात्र रास्ता है, या कहीं-कहीं परिवार की कई पीढ़ियां एक-दूसरे के करीब रहकर भी जीवन को आसान बना सकती हैं। हम संयुक्त परिवार को जबरन वापस नहीं ला सकते और न ही न्यूक्लियर परिवार को गलत ठहरा सकते हैं। लेकिन हम उस प्रेम, सहयोग और जिम्मेदारी को जरूर वापस ला सकते हैं, जिसने कभी छोटे-से घर को भी बड़ा बना दिया था।क्योंकि आखिरकार, घर की पहचान उसकी दीवारों से नहीं, उसमें रहने वाले लोगों के व्यवहार से होती है। मकान हमें छत देता है, लेकिन परिवार हमें सहारा देता है।।और शायद विश्व हैबिटेट दिवस का सबसे मानवीय संदेश यही है।
“सभी के लिए पर्याप्त आवास हो, लेकिन ऐसा घर भी हो जहां किसी अपने के लिए दरवाजा कभी बंद न हो।”



