02 अक्टूबर केवल दो महापुरुषों की जयंती का दिन नहीं है। यह दिन हमें दो ऐसे जीवनों के सामने खड़ा करता है, जिनकी सबसे बड़ी ताकत न सत्ता थी, न धन और न किसी तरह की व्यक्तिगत महत्वाकांक्षा। एक ने सत्य और अहिंसा को अपना हथियार बनाया, तो दूसरे ने सादगी, ईमानदारी और कर्तव्य को अपने जीवन का आधार बनाया।
हम महात्मा गांधी और लाल बहादुर शास्त्री के बारे में बचपन से पढ़ते आए हैं। स्कूल की किताबों में उनके जीवन की कहानियां पढ़ीं, भाषणों में उनके विचार सुने, उनकी तस्वीरों पर माल्यार्पण किया और राष्ट्रीय पर्वों पर उन्हें याद किया। शायद इसलिए जब 2 अक्टूबर आता है तो मन में एक सवाल भी उठता है। इन दोनों के बारे में ऐसा क्या नया कहा जाए, जो पहले नहीं कहा जा चुका?शायद नया कुछ कहने की जरूरत भी नहीं है। जरूरत है उन पुरानी बातों को आज की दुनिया की आंखों से फिर से देखने की। क्योंकि इतिहास में कुछ व्यक्तित्व ऐसे होते हैं, जिन्हें जितनी बार पढ़ा जाए, उतनी ही बार यह महसूस होता है कि उनकी जरूरत इतिहास के लिए नहीं, बल्कि वर्तमान के लिए अधिक है। 02 अक्टूबर ऐसा ही दिन है। जब दुनिया की एक बड़ी ताकत के सामने एक निहत्था व्यक्ति खड़ा हुआ, महात्मा गांधी को समझने के लिए केवल उनकी तस्वीर, चरखा, चश्मा या लाठी देखना पर्याप्त नहीं है। उन्हें उस समय की परिस्थितियों में देखना होगा, जब भारत ब्रिटिश शासन के अधीन था। ब्रिटिश साम्राज्य अपने समय की सबसे शक्तिशाली साम्राज्यवादी शक्तियों में से एक था। उसके पास विशाल प्रशासनिक व्यवस्था, सेना, आर्थिक शक्ति और दुनिया के अनेक हिस्सों में प्रभाव था। उसके सामने भारत था। एक ऐसा देश जो राजनीतिक रूप से स्वतंत्र नहीं था और जिसकी जनता लंबे समय से औपनिवेशिक शासन की कठिनाइयों को झेल रही थी। ऐसे समय में एक साधारण वेशभूषा वाला व्यक्ति सामने आता है।
# उसके हाथ में बंदूक नहीं है।
# उसके पीछे कोई सेना नहीं है।
# उसके पास सत्ता नहीं है।
लेकिन उसके पास एक ऐसा विश्वास है, जो किसी हथियार से कम शक्तिशाली नहीं था, सत्य और अहिंसा में विश्वास। गांधी ने यह दिखाने की कोशिश की कि अन्याय का विरोध करने के लिए स्वयं अन्यायी बन जाना जरूरी नहीं है। सत्ता से संघर्ष किया जा सकता है, लेकिन मनुष्य से घृणा किए बिना। विरोध किया जा सकता है, लेकिन हिंसा को अपना रास्ता बनाए बिना। यही उनके दर्शन की सबसे बड़ी ताकत थी।लाठियां पड़ीं, गिरफ्तारियां हुईं, जेल गए, अपमान सहा, विरोध झेला, लेकिन उन्होंने अपने संघर्ष का रास्ता नहीं बदला।यहां गांधी को समझने की एक बहुत महत्वपूर्ण बात सामने आती है। अहिंसा कमजोरी का दूसरा नाम नहीं है। कमजोर व्यक्ति अक्सर संघर्ष से बचता है। अहिंसा का रास्ता चुनने वाला व्यक्ति संघर्ष से भागता नहीं, बल्कि संघर्ष के बीच भी अपने भीतर की हिंसा को नियंत्रित करने का साहस रखता है। यही गांधी की सबसे बड़ी शक्ति थी।
अहिंसा दिवस : गांधी को याद करने का असली अर्थ
02 अक्टूबर को भारत में गांधी जयंती के साथ अंतरराष्ट्रीय अहिंसा दिवस भी मनाया जाता है। संयुक्त राष्ट्र ने गांधी के जन्मदिन को अहिंसा के संदेश को आगे बढ़ाने के लिए अंतरराष्ट्रीय दिवस के रूप में मान्यता दी। इसका अर्थ केवल इतना नहीं है कि गांधी हिंसा के विरोधी थे।इसका अर्थ यह भी है कि दुनिया ने उनके विचार में एक ऐसा संदेश देखा, जिसकी सीमाएं भारत की स्वतंत्रता तक नहीं रुकतीं। आज दुनिया को देखें। कहीं युद्ध है, कहीं संघर्ष है, कहीं आतंक और हिंसा है, कहीं जातीय और धार्मिक तनाव है। राजनीतिक और सामाजिक मतभेद कई बार इतनी तेजी से दुश्मनी में बदल जाते हैं कि बातचीत की संभावना ही समाप्त हो जाती है। और केवल बंदूक से होने वाली हिंसा ही चिंता का विषय नहीं है। हमारे शब्द भी हिंसक हो सकते हैं। हमारी भाषा भी किसी को चोट पहुंचा सकती है।सोशल मीडिया पर किसी व्यक्ति को अपमानित करना, बिना तथ्य जाने उसके खिलाफ नफरत फैलाना, असहमति रखने वाले व्यक्ति को दुश्मन मान लेना, ये भी उस सामाजिक वातावरण को हिंसक बनाते हैं जिसमें हम सब रहते हैं। ऐसे समय में गांधी का सवाल हमारे सामने फिर खड़ा होता है :—
# क्या असहमति का जवाब नफरत होना जरूरी है?
# क्या किसी को गलत मानने के लिए उसे अपना दुश्मन मानना जरूरी है?
# क्या अपनी बात मनवाने के लिए दूसरे को अपमानित करना जरूरी है?
शायद नहीं।
और यहीं अहिंसा दिवस की वास्तविक प्रासंगिकता सामने आती है। अहिंसा का अर्थ अन्याय को स्वीकार करना नहीं है। अहिंसा का अर्थ यह भी नहीं कि अन्याय के सामने चुप रहा जाए। गांधी का रास्ता तो इसके उलट था, अन्याय का विरोध करो, लेकिन विरोध करते हुए अपने भीतर भी वही हिंसा मत पैदा होने दो, जिसके खिलाफ तुम खड़े हुए हो। आज की दुनिया में यह विचार शायद पहले से ज्यादा जरूरी है।
गांधी को समझना है तो उन्हें केवल सोशल मीडिया की बहसों से बाहर निकालना होगा
आज गांधी पर बहुत कुछ लिखा और कहा जाता है। सोशल मीडिया के दौर में किसी भी ऐतिहासिक व्यक्तित्व को लेकर कुछ सेकंड में कोई दावा सामने आ जाता है। कोई प्रशंसा करता है, कोई आलोचना करता है, कोई एक घटना के आधार पर पूरे व्यक्तित्व का फैसला सुना देता है। गांधी भी इस बहस से अछूते नहीं हैं। उनके विचारों की आलोचना हो सकती है। उनके निर्णयों पर इतिहासकारों की अलग-अलग राय हो सकती है। किसी भी ऐतिहासिक व्यक्तित्व को आलोचनात्मक दृष्टि से देखना गलत नहीं है। लेकिन समस्या तब शुरू होती है जब इतिहास को समझने के बजाय उसे टुकड़ों में बांटकर अपनी पसंद का निष्कर्ष निकाल लिया जाता है। गांधी को समझने के लिए उनके पूरे जीवन, उनके संघर्ष, उनके प्रयोग, उनकी सफलताओं, उनकी सीमाओं और उनके समय की परिस्थितियों को समझना होगा। किसी महापुरुष को देवता बना देना भी इतिहास को समझना नहीं है और कुछ कमियों के आधार पर उसके पूरे योगदान को नकार देना भी इतिहास को समझना नहीं है।गांधी को गांधी की तरह ही देखना होगा। एक ऐसे मनुष्य के रूप में जिसने अपने समय के सबसे कठिन सवालों के बीच अपने सिद्धांतों के साथ प्रयोग किए और अपने जीवन को सार्वजनिक विमर्श का हिस्सा बना दिया। उनकी सबसे बड़ी विरासत शायद यही है कि उन्होंने कहा नहीं, जीकर दिखाने की कोशिश की।
और फिर आते हैं लाल बहादुर शास्त्री
अगर गांधी का जीवन हमें बताता है कि बिना हथियार के भी अन्याय के सामने खड़ा हुआ जा सकता है, तो लाल बहादुर शास्त्री का जीवन बताता है कि बिना दिखावे के भी बड़ा नेतृत्व किया जा सकता है। शास्त्री जी का जीवन भारतीय सार्वजनिक जीवन में सादगी और ईमानदारी की ऐसी मिसाल है, जिसे याद करते हुए आज भी यह सवाल उठता है कि क्या सार्वजनिक पद वास्तव में व्यक्ति को बदलना चाहिए, या व्यक्ति को अपने चरित्र के साथ पद को गरिमा देनी चाहिए?एक साधारण परिवार में जन्म लेने वाला बालक आगे चलकर देश का प्रधानमंत्री बना। लेकिन प्रधानमंत्री बनने के बाद भी उनके जीवन में वह चमक-दमक नहीं आई, जिसे आज हम अक्सर बड़े पद के साथ जोड़ते हैं। उनकी सादगी केवल कपड़ों या रहन-सहन तक सीमित नहीं थी। सादगी उनके चरित्र का हिस्सा थी।
और ईमानदारी केवल भाषण का विषय नहीं, बल्कि उनके सार्वजनिक जीवन का आधार थी। यही कारण है कि शास्त्री जी को याद करते समय केवल उनके प्रधानमंत्री बनने की घटना महत्वपूर्ण नहीं है। महत्वपूर्ण यह है कि इतने बड़े पद पर पहुंचने के बाद भी उन्होंने स्वयं को पद से बड़ा नहीं समझा।
“जय जवान, जय किसान” केवल नारा नहीं था
1965 का भारत कठिन परिस्थितियों से गुजर रहा था। देश को बाहरी चुनौती का सामना करना पड़ा। दूसरी ओर खाद्य सुरक्षा भी एक बड़ी चिंता थी। ऐसे समय में शास्त्री जी ने “जय जवान, जय किसान” का आह्वान किया। यह केवल एक लोकप्रिय नारा नहीं था। इसके पीछे देश की दो बुनियादी शक्तियों के सम्मान की भावना थी, सीमा की रक्षा करने वाला जवान और देश के लोगों का पेट भरने वाला किसान। एक देश केवल सीमा की सुरक्षा से मजबूत नहीं होता और केवल आर्थिक विकास से भी नहीं। उसे सुरक्षित रखने वालों और उसे जीवित रखने वालों दोनों का सम्मान करना पड़ता है। शास्त्री जी का यह संदेश आज भी उतना ही प्रासंगिक है। आज हम देश की प्रगति की बात करते हैं। बड़ी अर्थव्यवस्था, आधुनिक तकनीक, नए उद्योग, नई सुविधाएं—इन सबकी जरूरत है। लेकिन इसके साथ यह भी याद रखना होगा कि किसी भी राष्ट्र की असली ताकत केवल उसकी आर्थिक क्षमता नहीं, बल्कि उसके नागरिकों के चरित्र, श्रम और जिम्मेदारी में होती है।
गांधी और शास्त्री : दो व्यक्तित्व, लेकिन एक साझा संदेश
गांधी और शास्त्री को एक साथ याद करने का सबसे सुंदर कारण शायद यह है कि दोनों के जीवन में सादगी और जिम्मेदारी दिखाई देती है।
* गांधी के पास सत्ता नहीं थी, लेकिन उनके विचारों में इतनी शक्ति थी कि करोड़ों लोग उनके पीछे चल पड़े।
* शास्त्री के पास सत्ता थी, लेकिन सत्ता ने उनकी सादगी और विनम्रता को खत्म नहीं किया।
* गांधी ने बताया कि सत्य के लिए खड़े होने वाला व्यक्ति अकेला होकर भी शक्तिशाली हो सकता है।
* शास्त्री ने दिखाया कि बड़ी जिम्मेदारी संभालने वाला व्यक्ति विनम्र और सादा रहकर भी प्रभावशाली नेतृत्व कर सकता है।
* एक ने अन्याय के सामने झुकने से इनकार किया।
* दूसरे ने पद के सामने अपने चरित्र को झुकने नहीं दिया।
* एक ने अहिंसा को संघर्ष का रास्ता बनाया।
* दूसरे ने ईमानदारी और अनुशासन को सार्वजनिक जीवन का आधार बनाया।और दोनों के जीवन में एक बात समान थी।
व्यक्ति की असली ऊंचाई उसके पास मौजूद शक्ति से नहीं, बल्कि उस शक्ति के इस्तेमाल के तरीके से तय होती है।आज के समय में इन दोनों की जरूरत क्यों महसूस होती है? यह सवाल शायद 02 अक्टूबर का सबसे जरूरी सवाल है।अगर दुनिया पूरी तरह शांत होती, समाज में कटुता नहीं होती, सार्वजनिक जीवन में ईमानदारी पर कोई सवाल नहीं उठता और हर व्यक्ति अपनी जिम्मेदारी समझता, तो शायद गांधी और शास्त्री को याद करना केवल इतिहास को याद करना होता। लेकिन हमारा समय ऐसा नहीं है।आज दुनिया के कई हिस्से संघर्ष और युद्ध से गुजर रहे हैं।
* हथियारों की ताकत बढ़ रही है।
* देश एक-दूसरे के सामने खड़े हैं।
* समाजों के भीतर भी वैचारिक और सामाजिक दूरी बढ़ती दिखाई देती है।
ऐसे समय में गांधी हमें याद दिलाते हैं कि शांति केवल युद्ध समाप्त होने का नाम नहीं है। शांति मनुष्य के भीतर से शुरू होती है।।और शास्त्री हमें याद दिलाते हैं कि देश केवल सरकारों से नहीं चलता। देश नागरिकों की जिम्मेदारी से चलता है।
* ईमानदारी केवल किसी बड़े घोटाले से बचने का नाम नहीं है।
* ईमानदारी यह भी है कि हम अपने छोटे काम में बेईमानी न करें।
* कर्तव्य केवल सैनिक का नहीं है।
* हर नागरिक का अपना कर्तव्य है।
* सादगी केवल पुराने जमाने की चीज नहीं है।
आज जब जीवन में दिखावे का दबाव बढ़ रहा है, तब सादगी का अर्थ है, जरूरत और लालच के बीच फर्क समझना।
अहिंसा केवल युद्ध रोकने का विचार नहीं है। यह घर में, सड़क पर, कार्यालय में, समाज में और इंटरनेट पर अपने व्यवहार को नियंत्रित करने का नाम भी है।
शायद आज गांधी और शास्त्री को पढ़ने का सबसे सही तरीका यही है
* हमें यह तय करने की जरूरत नहीं कि इनमें से कौन बड़ा था।
* हमें यह भी तय करने की जरूरत नहीं कि किसका योगदान अधिक था।
* गांधी और शास्त्री अपने-अपने समय और परिस्थितियों के व्यक्तित्व थे।
जरूरत इस बात की है कि हम देखें कि उनके जीवन से आज क्या लिया जा सकता है। गांधी से हम सीख सकते हैं कि सत्य के लिए खड़ा होना आसान नहीं होता, लेकिन कठिन होने के कारण सत्य की कीमत कम नहीं हो जाती।उनसे यह भी सीख सकते हैं कि अहिंसा का अर्थ कायरता नहीं, बल्कि अपने क्रोध और प्रतिशोध पर नियंत्रण रखने का साहस है। शास्त्री से सीख सकते हैं कि बड़ा बनने के लिए बड़ा दिखना जरूरी नहीं है। ईमानदारी तब सबसे अधिक मूल्यवान होती है जब उसके बदले तत्काल कोई पुरस्कार नहीं मिलता। सादगी तब सार्थक होती है जब वह मजबूरी नहीं, बल्कि जीवन का चुनाव हो।और राष्ट्रसेवा तब वास्तविक होती है जब उसके पीछे निजी लाभ से ज्यादा कर्तव्य की भावना हो।
श्रद्धांजलि से आगे : क्या हम कुछ अपने भीतर बदल सकते हैं?
हर साल 02 अक्टूबर को गांधी और शास्त्री को याद किया जाएगा।
* स्कूलों में कार्यक्रम होंगे।
* सरकारी कार्यालयों में आयोजन होंगे।
* तस्वीरों पर फूल चढ़ेंगे।
* भाषण होंगे।
* सोशल मीडिया पर संदेश साझा होंगे।
यह सब अपनी जगह जरूरी है। लेकिन शायद इस दिन का सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा वह होगा जो इन सबके बाद हमारे भीतर बचा रह जाए।
* अगर गांधी की तस्वीर देखकर हम सत्य बोलने का साहस नहीं जुटा पाए, तो हमने गांधी को कितना समझा?
* अगर अहिंसा दिवस पर हम शांति की बात करें लेकिन असहमति रखने वाले व्यक्ति को अपमानित कर दें, तो हमने अहिंसा को कितना समझा?
* अगर शास्त्री की सादगी की प्रशंसा करें लेकिन अपने जीवन में हर चीज को दिखावे और प्रतिष्ठा से मापें, तो हमने शास्त्री को कितना समझा?
* और अगर ईमानदारी की बात केवल दूसरों के लिए करें, अपने लिए नहीं, तो शास्त्री जी की विरासत का अर्थ क्या रह जाएगा?
शायद महापुरुषों को याद करने का सबसे अच्छा तरीका उनकी मूर्तियों पर फूल चढ़ाना भर नहीं है। उनके जीवन से एक मूल्य चुनकर अपने जीवन में उतारना है।
* गांधी से सत्य।
* गांधी से अहिंसा।
* शास्त्री से सादगी।
* शास्त्री से ईमानदारी।
और दोनों से, कर्तव्य।
यही 2 अक्टूबर की सबसे बड़ी सीख हो सकती है। महापुरुष इतिहास में जन्म लेते हैं, लेकिन उनके विचार तभी जीवित रहते हैं जब अगली पीढ़ियां उन्हें अपने समय में फिर से समझती हैं। आज दुनिया को शायद किसी नए गांधी या नए शास्त्री की प्रतीक्षा करने के बजाय उन मूल्यों की जरूरत है, जिन्हें गांधी और शास्त्री ने अपने जीवन से सामने रखा था। क्योंकि युद्ध रोकने की शुरुआत केवल सीमाओं पर नहीं होती। हिंसा रोकने की शुरुआत केवल हथियारों से नहीं होती। ईमानदार समाज बनाने की शुरुआत केवल कानूनों से नहीं होती। यह शुरुआत हमसे होती है। और शायद यही 2 अक्टूबर को गांधी और शास्त्री को याद करने का सबसे सच्चा अर्थ है। उनकी तस्वीर को याद रखने से ज्यादा, उनके विचारों को अपने व्यवहार में जिंदा रखना।
सत्य के लिए खड़े होने का साहस रखें।
अहिंसा को कमजोरी नहीं, शक्ति समझें। सादगी को पिछड़ापन नहीं, चरित्र मानें। ईमानदारी को आदर्श नहीं, जीवन का आधार बनाएं। और देश से केवल यह न पूछें कि वह हमें क्या दे रहा है, कभी यह भी पूछें कि हम देश और समाज के लिए क्या कर रहे हैं।यही गांधी को सच्ची श्रद्धांजलि होगी।
यही शास्त्री को सच्चा सम्मान होगा।



