हम इंसानों ने एक-दूसरे तक अपनी बात पहुंचाने के लिए शब्दों, आवाज, भाषा और लिपि का सहारा लिया है। लेकिन क्या संवाद केवल वही है जो हमारे कान सुन सकें? क्या कोई व्यक्ति इसलिए कम संवेदनशील हो जाता है क्योंकि वह हमारी आवाज नहीं सुन सकता? क्या वह इसलिए कम भावनाएं रखता है क्योंकि वह अपनी बात बोलकर नहीं कह सकता? क्या उसके सपने, इच्छाएं, खुशियां, दुख, डर, प्यार और सम्मान की जरूरत हमसे अलग होती है?
बिल्कुल नहीं।
उसकी भाषा अलग हो सकती है, संवाद का माध्यम अलग हो सकता है, लेकिन वह भी उतना ही इंसान है जितने हम हैं। उसके भीतर भी वही भावनाएं हैं, वही सपने हैं और आगे बढ़ने की वही इच्छा है।इसी मानवीय सोच को मजबूत करने के उद्देश्य से हर वर्ष 23 सितंबर को अंतरराष्ट्रीय सांकेतिक भाषा दिवस मनाया जाता है। संयुक्त राष्ट्र के अनुसार 2026 की थीम है—“Declaring Deaf People’s Human Rights”, अर्थात “बधिर लोगों के मानवाधिकारों को सुनिश्चित करना”। इस वर्ष यह अवसर इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि विश्व बधिर महासंघ (WFD) की स्थापना के 75 वर्ष और दिव्यांग व्यक्तियों के अधिकारों पर संयुक्त राष्ट्र कन्वेंशन (CRPD) को अपनाए जाने के 20 वर्ष पूरे हो रहे हैं।
सांकेतिक भाषा केवल हाथों की भाषा नहीं, अधिकार और सम्मान की भाषा है
सांकेतिक भाषाएं किसी इशारे या हाथ हिलाने भर का नाम नहीं हैं। संयुक्त राष्ट्र के अनुसार ये पूरी तरह विकसित प्राकृतिक भाषाएं हैं और इनकी अपनी संरचना होती है। दुनिया में 300 से अधिक अलग-अलग सांकेतिक भाषाओं का उपयोग किया जाता है। दुनिया में करोड़ों बधिर लोग सांकेतिक भाषाओं के माध्यम से शिक्षा प्राप्त करते हैं, अपने परिवार और समाज से जुड़ते हैं, काम करते हैं और अपनी प्रतिभा का प्रदर्शन करते हैं।इसलिए सांकेतिक भाषा को केवल “विशेष लोगों के लिए बनाई गई व्यवस्था” मानना सही नहीं है। यह उनके अभिव्यक्ति, शिक्षा, जानकारी, सामाजिक भागीदारी और अधिकारों का महत्वपूर्ण माध्यम है। संयुक्त राष्ट्र भी इस बात को रेखांकित करता है कि सांकेतिक भाषा में शुरुआती पहुंच और गुणवत्तापूर्ण शिक्षा बधिर व्यक्ति के विकास और उसके अधिकारों की पूर्ण भागीदारी के लिए महत्वपूर्ण है।
हमें उनकी कमी नहीं, उनकी क्षमता देखनी होगी
हमारे समाज में एक समस्या यह भी है कि हम कई बार किसी व्यक्ति को उसकी शारीरिक स्थिति के आधार पर पहचानने लगते हैं।कोई सुन नहीं सकता तो हम उसे “कमजोर” समझ लेते हैं। कोई बोल नहीं सकता तो हम मान लेते हैं कि शायद वह हमारी तरह समझ नहीं सकता। लेकिन यह सोच गलत है। सुनने या बोलने की क्षमता और बुद्धिमत्ता एक ही चीज नहीं हैं। किसी व्यक्ति की एक क्षमता प्रभावित होने का अर्थ यह नहीं कि उसकी पूरी प्रतिभा समाप्त हो गई। उचित शिक्षा, प्रशिक्षण, अवसर और सहयोग मिलने पर व्यक्ति अपनी दूसरी क्षमताओं को विकसित कर सकता है और अनेक क्षेत्रों में उत्कृष्ट उपलब्धियां हासिल कर सकता है। इसलिए हमें यह सोच बदलनी होगी कि “वह क्या नहीं कर सकता?” इसके बजाय सवाल होना चाहिए कि “उसे अवसर मिले तो वह क्या कर सकता है?” उपलब्धियां बताती हैं कि प्रतिभा आवाज की मोहताज नहीं, दक्षिण अफ्रीका के तैराक टेरेंस पार्किन इसका एक प्रेरक उदाहरण हैं। वे बधिर हैं। उन्होंने वर्ष 2000 के सिडनी ओलंपिक में पुरुषों की 200 मीटर ब्रेस्टस्ट्रोक स्पर्धा में रजत पदक जीता। अंतरराष्ट्रीय बधिर खेल समिति के रिकॉर्ड के अनुसार उन्होंने Deaflympics में 29 स्वर्ण, 3 रजत और 1 कांस्य सहित कुल 33 पदक जीते। वे सामान्य अंतरराष्ट्रीय तैराकी प्रतियोगिताओं में भी सफल रहे और 2001 में उन्हें Sportsman of the Year चुना गया। भारत का उदाहरण भी हमारे सामने है। भारतीय टेनिस खिलाड़ी पृथ्वी शेखर ने Deaflympics में पदक जीते हैं और 2019 में अंतरराष्ट्रीय बधिर खेल समिति की Sportsman of the Year सूची में भारत की ओर से शीर्ष नाम के रूप में दर्ज हुए। उनके रिकॉर्ड में 2022 Deaflympics में पुरुष युगल का रजत तथा मिश्रित युगल और पुरुष एकल में कांस्य पदक भी दर्ज हैं। इन उदाहरणों का उद्देश्य यह कहना नहीं है कि हर व्यक्ति को किसी पदक या बड़ी उपलब्धि से अपनी योग्यता साबित करनी चाहिए।संदेश इससे कहीं बड़ा है, हर व्यक्ति को अपनी क्षमता दिखाने का अवसर मिलना चाहिए।
बचपन में शुरू करनी होगी सम्मान की शिक्षा
समाज में स्वीकार्यता केवल बड़े लोगों को समझाने से नहीं आएगी। इसकी शुरुआत बचपन से करनी होगी। बच्चे स्वभाव से जिज्ञासु होते हैं। उन्हें किसी ऐसे बच्चे को देखकर, जो अलग तरीके से संवाद करता है, हंसी आ सकती है। कभी वे उसकी बोलने की शैली की नकल कर सकते हैं, कभी उसकी सांकेतिक भाषा का मजाक बना सकते हैं या उसे अपने समूह से अलग कर सकते हैं। बच्चे के लिए यह कुछ क्षणों का मजाक हो सकता है।
लेकिन जिस बच्चे का मजाक बनाया जाता है, उसके लिए वह अनुभव बहुत गहरा और पीड़ादायक हो सकता है।
इसलिए हमें अपने बच्चों को बचपन से सिखाना होगा :—
# किसी की अलग भाषा मजाक का विषय नहीं है।
# किसी की शारीरिक स्थिति उसकी बुद्धिमत्ता का प्रमाण नहीं है।
# किसी की नकल करके हंसना संवेदनशीलता नहीं, बल्कि किसी की गरिमा को चोट पहुंचाना है।
और सबसे महत्वपूर्ण :—
# अलग होना गलत नहीं है।
# आज के बच्चे ही कल का समाज बनाएंगे
हम बच्चों को “प्लीज”, “सॉरी” और “थैंक यू” कहना सिखाते हैं। हमें उन्हें यह भी सिखाना चाहिए कि अगर सामने वाला व्यक्ति सुन नहीं सकता या बोलकर अपनी बात नहीं कह सकता तो उससे संवाद कैसे किया जाए। कूलों में सांकेतिक भाषा के कुछ प्राथमिक संकेतों का परिचय कराया जा सकता है। बच्चों को बताया जा सकता है कि सामने वाला व्यक्ति अलग है, लेकिन पराया नहीं। अगर बचपन से ही बच्चों को बधिर बच्चों और सांकेतिक भाषा का उपयोग करने वाले लोगों के साथ सम्मानपूर्वक संवाद करने का अवसर मिलेगा, तो बड़े होने पर उनके भीतर स्वीकार्यता स्वाभाविक होगी। जिस समाज में बच्चे बचपन से विविधता का सम्मान करना सीखते हैं, वहां बड़े होकर भेदभाव के लिए जगह कम होती जाती है।
हर व्यक्ति को कुछ बुनियादी सांकेतिक संकेत क्यों नहीं सीखने चाहिए?
सांकेतिक भाषा सीखना केवल बधिर लोगों की जिम्मेदारी क्यों हो? क्या हममें से हर व्यक्ति सांकेतिक भाषा का पूरा ज्ञान हासिल कर सकता है? शायद नहीं। लेकिन कुछ बुनियादी संकेत सीखना निश्चित रूप से उपयोगी हो सकता है। जैसे: —
मदद चाहिए, पानी, खाना, दर्द, खतरा, अस्पताल, पुलिस, इंतजार, हां, नहीं, धन्यवाद, माफ कीजिए। ऐसे प्राथमिक संकेत किसी कठिन परिस्थिति में संवाद का माध्यम बन सकते हैं। कल्पना कीजिए कि सड़क दुर्घटना में घायल कोई व्यक्ति बोल या सुन नहीं सकता। आसपास मौजूद लोगों को उसकी जरूरत समझ में नहीं आ रही। यदि वहां किसी एक व्यक्ति को कुछ बुनियादी सांकेतिक संकेत आते हों, तो वह उसकी आवश्यकता समझने और मदद पहुंचाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है। आपातकालीन परिस्थितियों में भाषा की बाधा कभी-कभी समय की बाधा भी बन सकती है। संयुक्त राष्ट्र ने भी सांकेतिक भाषा को सूचना और सेवाओं, विशेषकर आपातकालीन परिस्थितियों में पहुंच के लिए महत्वपूर्ण बताया है। इसलिए सांकेतिक भाषा सीखना केवल संवेदनशीलता नहीं, सामाजिक उपयोगिता भी है।
दया नहीं, बराबरी चाहिए
किसी बधिर व्यक्ति को देखकर हमें उसके लिए दया महसूस हो सकती है। लेकिन उससे भी ज्यादा जरूरी है कि हम उसके अधिकार और सम्मान को समझें।
* उसे अपने जीवन के फैसले लेने का अधिकार है।
* उसे शिक्षा का अधिकार है।
* उसे रोजगार का अधिकार है।
* उसे सामान्य व्यक्ति से विवाह का अधिकार है।
* उसे अपनी प्रतिभा दिखाने का अवसर मिलना चाहिए।
* उसे सार्वजनिक सेवाओं तक पहुंच मिलनी चाहिए।
और सबसे बढ़कर उसे समाज में सम्मान के साथ जीने का अधिकार है। संयुक्त राष्ट्र के अनुसार दिव्यांग व्यक्तियों के अधिकारों पर कन्वेंशन सांकेतिक भाषाओं को मान्यता देता है और उनके सीखने तथा बधिर समुदाय की भाषाई पहचान को बढ़ावा देने की बात करता है।
हर क्षेत्र में समान अवसर जरूरी
समानता का अर्थ केवल यह नहीं कि हम किसी व्यक्ति के साथ भेदभाव न करें।समानता का वास्तविक अर्थ है कि जहां आवश्यक हो, वहां उसे वह सुविधा और सहयोग भी मिले जिससे वह अपनी क्षमता के अनुसार आगे बढ़ सके। शिक्षा हो या खेल, कला हो या विज्ञान, तकनीक हो या रोजगार, प्रशासन हो या व्यवसाय या विवाह हर क्षेत्र में प्रतिभा को अवसर मिलना चाहिए। किसी व्यक्ति को सिर्फ इसलिए किसी क्षेत्र से बाहर नहीं कर देना चाहिए क्योंकि वह सुन नहीं सकता, बोल नहीं सकता या किसी अन्य शारीरिक चुनौती के साथ जीवन जी रहा है। क्योंकि हम यह पहले से तय नहीं कर सकते कि किसी व्यक्ति की क्षमता कितनी है।
दया से आगे, रिश्तों में भी बराबरी चाहिए
सामाजिक स्वीकार्यता की बात करते समय हमें एक ऐसे विषय पर भी ईमानदारी से बात करनी होगी, जिस पर समाज अक्सर चुप रहता है, रिश्तों और विवाह में स्वीकार्यता। हम सार्वजनिक रूप से कहते हैं कि बधिर या बोलने-सुनने में कठिनाई रखने वाले लोग भी हमारे समाज का अभिन्न हिस्सा हैं। हम उनके सम्मान, अधिकार और समान अवसर की बातें करते हैं। लेकिन जब बात हमारे अपने परिवार, रिश्ते या विवाह तक आती है, तो क्या हमारा व्यवहार वही रहता है?यह सवाल असहज जरूर है, लेकिन पूछना जरूरी है। कई बधिर व्यक्ति अपने ही समुदाय के लोगों के साथ अधिक सहज महसूस करते हैं। उनकी भाषा समान होती है, अनुभव समान होते हैं और एक-दूसरे को समझने में आसानी होती है। इसलिए अपने समुदाय के भीतर विवाह होना अपने आप में कोई गलत बात नहीं है। गलत तब है जब समाज की सोच किसी व्यक्ति के सामने दूसरे विकल्पों के दरवाजे ही बंद कर दे। अगर कोई सुन सकने वाला व्यक्ति किसी बधिर व्यक्ति को केवल इसलिए जीवनसाथी के रूप में स्वीकार करने से इंकार कर देता है क्योंकि वह सुन या बोल नहीं सकता, तो हमें एक बार अपने भीतर झांककर देखना चाहिए। क्या विवाह केवल आवाज सुनने और बोलने की क्षमता का संबंध है? क्या जीवनसाथी का मूल्य केवल इस बात से तय होना चाहिए कि वह हमारी तरह सुन और बोल सकता है या नहीं? एक सफल विवाह की बुनियाद क्या केवल बातचीत की एक ही पद्धति है, या फिर विश्वास, प्रेम, सम्मान, समझ, जिम्मेदारी, सहयोग और एक-दूसरे के प्रति संवेदना भी उतनी ही महत्वपूर्ण हैं? निश्चित रूप से किसी भी व्यक्ति को विवाह के लिए बाध्य नहीं किया जा सकता। जीवनसाथी चुनना हर व्यक्ति का व्यक्तिगत अधिकार और स्वतंत्र निर्णय है। लेकिन किसी व्यक्ति को केवल उसकी शारीरिक स्थिति के कारण पहले ही अयोग्य मान लेना हमारे सामाजिक पूर्वाग्रहों पर सवाल जरूर खड़ा करता है। हमें यह समझना होगा कि यदि बचपन से बधिर और सुनने वाले बच्चों को एक-दूसरे के साथ सम्मानपूर्वक संवाद करना, साथ पढ़ना और एक-दूसरे को स्वीकार करना सिखाया जाए, तो बड़े होने पर उनके बीच की दूरी भी कम हो सकती है। स्वीकार्यता की असली परीक्षा तब होती है जब कोई दूसरा व्यक्ति हमारे परिवार की चौखट तक पहुंचता है।दूसरों के अधिकारों की बात करना आसान है। लेकिन जब वही बात हमारे घर, हमारे बच्चों और हमारे रिश्तों के सामने आती है, तब हमारा व्यवहार ही बताता है कि हम वास्तव में कितने संवेदनशील हैं। इसलिए आज का संदेश केवल इतना नहीं होना चाहिए कि “उन्हें समाज में स्वीकार कीजिए।” बल्कि हमें खुद से पूछना चाहिए :—
“क्या मैं भी उन्हें अपने बराबर स्वीकार करने के लिए तैयार हूं?”
यही सवाल हमारी सोच और हमारी कथनी-करनी के बीच की दूरी को सामने ला सकता है।
अवसर दीजिए, प्रशिक्षण दीजिए, सहयोग दीजिए, फिर उसकी प्रतिभा को बोलने दीजिए।
परिवार और समाज की भूमिका भी उतनी ही महत्वपूर्ण
स्वीकार्यता की शुरुआत घर से होती है।परिवार को ऐसे बच्चे को उसकी कमी के रूप में नहीं देखना चाहिए। उसे उसकी रुचियों, क्षमताओं और सपनों के साथ आगे बढ़ने का अवसर देना चाहिए। समाज की भूमिका भी यही है कि वह उसे अलग-थलग न करे। किसी दुकान, अस्पताल, कार्यालय, बैंक, स्कूल, रेलवे स्टेशन या सार्वजनिक स्थान पर यदि कोई व्यक्ति सांकेतिक भाषा के माध्यम से संवाद करना चाहता है, तो हमें यह नहीं कहना चाहिए कि “हमें समझ नहीं आता, आप चले जाइए।”
* हम लिखकर बात कर सकते हैं।
* मोबाइल पर लिख सकते हैं।
* इशारों का सहारा ले सकते हैं।
* जरूरत हो तो दुभाषिए या अन्य उपलब्ध सहायता का उपयोग कर सकते हैं।
संवाद का रास्ता बंद करना आसान है, लेकिन इंसान तक पहुंचने का रास्ता तलाशना ही संवेदनशील समाज की पहचान है। हमें अपनी नजर बदलनी होगी, आज अंतरराष्ट्रीय सांकेतिक भाषा दिवस पर सबसे बड़ा सवाल यह नहीं होना चाहिए कि बधिर लोग समाज में कैसे घुलें-मिलें। सवाल यह होना चाहिए कि क्या हमारा समाज इतना खुला और संवेदनशील है कि उसमें हर व्यक्ति सम्मान के साथ अपनी जगह बना सके? हमें यह समझना होगा कि किसी व्यक्ति की पहचान केवल उसकी शारीरिक क्षमता से नहीं होती।
* वह एक बच्चा है।
* वह किसी का बेटा या बेटी है।
* वह किसी का भाई या बहन है।
* वह किसी का मित्र है।
* उसके सपने हैं।
* उसकी प्रतिभा है।
* उसकी अपनी पसंद और नापसंद है।
* उसकी अपनी भावनाएं हैं।
और सबसे पहले : —
# वह हममें से ही एक इंसान है।
# आज हम क्या संकल्प ले सकते हैं?
इस अंतरराष्ट्रीय सांकेतिक भाषा दिवस पर हम बहुत बड़ा बदलाव करने का दावा न करें। बस कुछ छोटे कदम उठाएं :—
एक: सांकेतिक भाषा के कुछ प्राथमिक संकेत सीखने की शुरुआत करें।
दो: अपने बच्चों को सिखाएं कि किसी बधिर या अलग तरीके से संवाद करने वाले बच्चे का मजाक नहीं उड़ाना है।
तीन: किसी ऐसे व्यक्ति से सामना हो तो उसे घूरने या उपेक्षा करने के बजाय सम्मानपूर्वक संवाद का प्रयास करें।
चार: स्कूलों और संस्थानों में सांकेतिक भाषा की बुनियादी जानकारी और जागरूकता को बढ़ावा दें।
पांच: शिक्षा, खेल, कला, विज्ञान और रोजगार—हर क्षेत्र में समान अवसर की सोच को मजबूत करें।
छह: किसी व्यक्ति को उसकी कमी से नहीं, उसकी क्षमता से पहचानें।
और सबसे महत्वपूर्ण :—
किसी बच्चे को ऐसा महसूस न होने दें कि वह बाकी बच्चों से कम है।
भाषा अलग हो सकती है, भावनाएं नहीं
हम अक्सर कहते हैं कि इंसान सामाजिक प्राणी है। लेकिन समाज तभी पूरा होता है जब उसमें हर इंसान के लिए जगह हो।
* कुछ लोग आवाज से संवाद करते हैं।
* कुछ लोग हाथों से।
* कुछ लिखकर।
* कुछ अपनी कला से।
* कुछ अपने काम से।
लेकिन अंततः हम सभी अपनी भावनाएं, अपने सपने और अपनी पहचान दुनिया तक पहुंचाना चाहते हैं। इसलिए आज हमें केवल सांकेतिक भाषा को समझने की कोशिश नहीं करनी है, बल्कि उस भाषा के पीछे खड़े इंसान को समझना है। हमें आने वाली पीढ़ी को यह सिखाना है कि किसी की अलग क्षमता उसका मजाक उड़ाने का कारण नहीं, बल्कि उसके प्रति संवेदनशील होने का अवसर है। हमें ऐसा समाज बनाना है जहां किसी बधिर बच्चे को यह डर न हो कि उसकी सांकेतिक भाषा देखकर कोई हंसेगा। जहां कोई युवा अपनी प्रतिभा दिखाने से पहले अपनी शारीरिक स्थिति के कारण दरवाजे बंद होते न देखे। जहां किसी व्यक्ति को दया की नजर से नहीं, सम्मान की नजर से देखा जाए। और जहां जरूरत पड़ने पर हममें से कोई इतना जरूर जानता हो कि सामने वाला क्या कहना चाहता है।
क्यूंकि किसी की आवाज हमारे कानों तक नहीं पहुंचती, इसका मतलब यह नहीं कि उसके भीतर कोई आवाज नहीं है।
भाषा अलग हो सकती है, भावनाएं नहीं।
संवाद का तरीका अलग हो सकता है, इंसानियत नहीं।
क्षमता का स्वरूप अलग हो सकता है, सपने नहीं।
आइए, आज से हम केवल बोलने और सुनने वाला समाज नहीं, बल्कि समझने वाला समाज बनने की कोशिश करें।
“किसी इंसान को उसकी कमी से मत पहचानिए, उसकी क्षमता को पहचानिए।
उसे दया नहीं, अवसर दीजिए।
उसे अलग मत कीजिए, संवाद का रास्ता खोजिए।
क्योंकि सम्मान की भाषा ऐसी भाषा है, जिसे हर इंसान समझ सकता है।”
(डिस्क्लेमर :— यह सामग्री जागरूकता और सामाजिक संवेदनशीलता के उद्देश्य से प्रस्तुत की गई है। इसका उद्देश्य किसी व्यक्ति या समुदाय को अलग नजर से देखना नहीं, बल्कि समान सम्मान, अवसर और मानवीय गरिमा के प्रति जागरूकता बढ़ाना है।)



