भारत की खूबसूरती केवल इसकी विशाल आबादी, अनेक भाषाओं और विविध परंपराओं में नहीं, बल्कि इस बात में भी है कि यहां अलग-अलग धर्मों और समुदायों ने मिलकर राष्ट्र की पहचान को गढ़ा है। इसी विविधता में पारसी समुदाय का योगदान संख्या से कहीं अधिक बड़ा और प्रभावशाली रहा है। पारसी नववर्ष नवरोज़ 2026 में 16 अगस्त को मनाया जा रहा है। 15 अगस्त को भारत का स्वतंत्रता दिवस होने के कारण पारसी नववर्ष से जुड़ा पटेती उसी दिन पड़ा, जबकि नववर्ष का मुख्य दिन 16 अगस्त है। इसलिए आज हम पारसी समाज को नवरोज़ की हार्दिक शुभकामनाएं देते हुए उस समुदाय को समझने का प्रयास करें, जिसने भारत को उद्योग, विज्ञान, शिक्षा, रक्षा, व्यापार, कला और समाजसेवा के क्षेत्र में असाधारण योगदान दिया है।
पारसी कौन हैं और उनका इतिहास क्या है?
पारसी भारतीय उपमहाद्वीप में बसे जरथुस्त्री या जोरोएस्ट्रियन धर्म के अनुयायी हैं। यह दुनिया के प्राचीनतम जीवित धर्मों में से एक है, जिसकी परंपरा पैगंबर जरथुस्त्र की शिक्षाओं से जुड़ी है। जिनके धर्म का मूल संदेश मनुष्य के नैतिक आचरण पर केंद्रित है—सद्विचार, सद्वचन और सद्कर्म यानी अच्छे विचार, अच्छे शब्द और अच्छे कर्म।
ईरान में इस्लामी विजय के बाद वहां के कुछ जरथुस्त्री समुदायों ने अपनी धार्मिक और सांस्कृतिक पहचान सुरक्षित रखने के लिए भारत की ओर पलायन किया। भारत में उनके आगमन से जुड़ी संजान की प्रसिद्ध परंपरा बताती है कि उन्होंने गुजरात के तट पर अपना बसेरा बनाया और धीरे-धीरे भारतीय समाज का हिस्सा बन गए। उनके भारत में समाहित होने की कहानी भारतीय सहिष्णुता और सामाजिक समरसता का भी उदाहरण बन गई। पारसी समुदाय ने अपनी धार्मिक पहचान को सुरक्षित रखा, लेकिन भारतीय समाज के विकास में सक्रिय भागीदारी की।
जीवन पद्धति में क्या खास है?
पारसी जीवन-दर्शन में केवल धार्मिक अनुष्ठान ही महत्वपूर्ण नहीं हैं, बल्कि ईमानदारी, परिश्रम, जिम्मेदारी, स्वच्छता, परोपकार और समाज के प्रति दायित्व जैसे मूल्यों को विशेष महत्व दिया जाता है।।यही कारण है कि पारसी समुदाय के अनेक परिवारों ने अपनी व्यक्तिगत संपत्ति को केवल निजी सुख के लिए नहीं, बल्कि अस्पतालों, शिक्षण संस्थानों, आवास, शोध संस्थानों और जनकल्याण के कार्यों में लगाया।।यहां से हमें एक महत्वपूर्ण सीख मिलती है, समाज में किसी समुदाय का प्रभाव उसकी संख्या से नहीं, बल्कि उसके योगदान की गुणवत्ता से भी तय होता है।
भारत के विकास में पारसियों का योगदान
भारत के आधुनिक औद्योगिक विकास की चर्चा पारसी समुदाय के योगदान के बिना अधूरी रहेगी। टाटा, गोदरेज और वाडिया जैसे नाम भारतीय उद्योग और उद्यमिता के इतिहास में महत्वपूर्ण स्थान रखते हैं। पारसी उद्योगपतियों ने व्यापार को केवल लाभ कमाने का माध्यम न बनाकर रोजगार, शिक्षा, अनुसंधान और सामाजिक विकास से जोड़ने की परंपरा को मजबूत किया। जमशेदजी टाटा ने भारत में आधुनिक उद्योग और वैज्ञानिक सोच की मजबूत नींव रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। टाटा परिवार की परोपकारी परंपरा ने शिक्षा और शोध सहित अनेक क्षेत्रों को प्रभावित किया।
गोदरेज परिवार ने भारतीय उद्योग और उद्यमिता में महत्वपूर्ण योगदान दिया, जबकि वाडिया परिवार का नाम भारत के जहाज निर्माण और औद्योगिक इतिहास से जुड़ा है। विज्ञान और तकनीक में डॉ. होमी जहांगीर भाभा का योगदान भारत के परमाणु कार्यक्रम की आधारशिला से जुड़ा है। रक्षा के क्षेत्र में फील्ड मार्शल सैम मानेकशॉ ने भारतीय सेना के इतिहास में अपना विशिष्ट स्थान बनाया। भारत की खेल, शिक्षा, चिकित्सा, कानून और कला की दुनिया में भी अनेक पारसी व्यक्तित्वों ने उल्लेखनीय योगदान दिया। 2026 में आयोजित राष्ट्रीय स्तर के एक कार्यक्रम में केंद्रीय अल्पसंख्यक कार्य मंत्रालय ने भी पारसी समुदाय के भारत की औद्योगिक और आर्थिक नींव को मजबूत करने में योगदान को रेखांकित किया।
केवल भारत ही नहीं, दुनिया को भी दिया योगदान
पारसी और व्यापक जरथुस्त्री समुदाय की उपलब्धियां भारत तक सीमित नहीं हैं। व्यापार, उद्योग, विज्ञान, शिक्षा, चिकित्सा, कला और सार्वजनिक जीवन में इस छोटे समुदाय से निकले अनेक लोगों ने अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पहचान बनाई। यह समुदाय हमें यह भी दिखाता है कि संख्या छोटी होने के बावजूद विचार, प्रतिभा, मेहनत और समाज के प्रति जिम्मेदारी किसी समुदाय को विश्व स्तर पर प्रभावशाली बना सकती है।
आज पारसी समुदाय के सामने सबसे बड़ी चुनौती क्या है?
इतने बड़े योगदान के बावजूद आज पारसी समुदाय स्वयं जनसंख्या में गिरावट की गंभीर चुनौती का सामना कर रहा है।
भारत सरकार के उपलब्ध जनगणना आंकड़ों के अनुसार पारसी आबादी 1941 में लगभग 1,14,000 थी, जो 2011 की जनगणना में घटकर 57,264 रह गई। सरकार ने इस चुनौती से निपटने के लिए 2013-14 में ‘जियो पारसी’ योजना शुरू की। जनसंख्या में कमी के पीछे कम जन्मदर, देर से विवाह, अविवाहित रहने की प्रवृत्ति, बदलती सामाजिक परिस्थितियां और समुदाय की वृद्ध होती आबादी जैसे कई कारण बताए गए हैं। 2026 में केंद्र सरकार की जियो पारसी सलाहकार समिति की बैठक में भी इन जनसांख्यिकीय और सामाजिक कारणों पर चर्चा हुई। इसलिए पारसी समुदाय की विरासत को बचाने का प्रश्न केवल किसी एक धर्म या समुदाय का प्रश्न नहीं है। यह भारत की सांस्कृतिक विविधता और ऐतिहासिक विरासत को सुरक्षित रखने का भी प्रश्न है।
आज की स्थिति हमें क्या सोचने पर मजबूर करती है?
एक ऐसा समुदाय, जिसने भारत के औद्योगिक विकास, विज्ञान, शिक्षा, रक्षा और समाजसेवा में इतना बड़ा योगदान दिया, आज संख्या के लिहाज से लगातार छोटा होता जा रहा है। यह स्थिति हमें यह सोचने पर मजबूर करती है कि किसी समुदाय की संस्कृति, भाषा, परंपरा और ज्ञान को अगली पीढ़ी तक पहुंचाना कितना आवश्यक है। सरकार की ‘जियो पारसी’ योजना इसी चिंता को ध्यान में रखते हुए चिकित्सा सहायता, बच्चों और बुजुर्गों की देखभाल तथा परिवार-केंद्रित सहायता जैसे प्रयास करती है।
नवरोज़ केवल कैलेंडर बदलने का दिन नहीं, बल्कि नए आरंभ, आत्मचिंतन और बेहतर जीवन की ओर बढ़ने का अवसर है। पारसी जीवन-दर्शन का प्रसिद्ध आधार, अच्छे विचार, अच्छे शब्द और अच्छे कर्म, आज भी उतना ही प्रासंगिक है। आज जब हम नवरोज़ की शुभकामनाएं देते हैं, तो यह शुभकामना केवल पारसी समाज के लिए नहीं, बल्कि उस भारत की भावना के लिए भी है जिसमें अनेक धर्म, भाषाएं और संस्कृतियां मिलकर एक राष्ट्र बनाती हैं।
पारसी समाज को नवरोज़ मुबारक।
जिस समुदाय ने भारत के निर्माण में अपनी प्रतिभा, मेहनत, ईमानदारी और सेवा की इतनी बड़ी भूमिका निभाई, उसकी विरासत सुरक्षित रहे, उसकी नई पीढ़ी आगे बढ़े और भारत की विकास यात्रा में उसका योगदान आने वाली पीढ़ियों तक जारी रहे। यही नवरोज़ पर हमारी सच्ची शुभकामना है।



