बसंत पंचमी का पर्व माघ माह के शुक्ल पक्ष की पंचमी तिथि को मनाया जाता है। यह तिथि अबूझ संज्ञक शुभ मुहूर्त की श्रेणी में आती है। इस श्री पंचमी का पर्व कुछ खास ज्योतिषीय योग में मनाया जाएगा. बसंत पंचमी को श्री पंचमी व श्री राधा श्याम सुंदर पंचमी आदि नामों से भी जाना जाता है । भारत में कई त्यौहार मनाये जाते हैं, जो न केवल एक उत्सव होते हैं, बल्कि पर्यावरण में आने वाले बदलाव के सूचक भी होते हैं . हिंदी पंचाग की तिथीयाँ अपने साथ मौसमी बदलाव का संकेत भी देती हैं जो कि पुर्णतः प्राकृतिक होते हैं. उन्ही त्यौहारों में एक त्यौहार है वसंत पंचमी।
आज 23 जनवरी 2026 को पूरे देश में हर्षोल्लास और श्रद्धा के साथ बसंत पंचमी का पावन पर्व मनाया जा रहा है। यह दिन भारतीय संस्कृति में विशेष महत्व रखता है क्योंकि इसी दिन ज्ञान, बुद्धि, कला और संगीत की देवी माँ सरस्वती की आराधना की जाती है। बसंत पंचमी न केवल धार्मिक पर्व है, बल्कि यह ऋतु परिवर्तन, नई ऊर्जा, सृजन और सकारात्मकता का भी प्रतीक है। शीत ऋतु के अंत और बसंत ऋतु के आगमन का संकेत देने वाला यह पर्व किसानों, विद्यार्थियों, कलाकारों और शिक्षकों के लिए विशेष शुभ माना जाता है।
बसंत पंचमी पूजा के शुभ मुहूर्त
* मुख्य शुभ समय (सर्वोत्तम):
सुबह ~07:15 बजे से दोपहर ~12:50 बजे तक पूजा और सरस्वती आशीर्वाद हेतु सर्वोत्तम समय माना जाता है।
* विशेष शुभ चौघड़िया (समय विखंडन):
चल चौघड़िया: 07:13 – 08:33
लाभ चौघड़िया: 08:33 – 09:53
अमृत चौघड़िया: 09:53 – 11:13
इन समयों पर पूजा विशेष फलदायी मानी जाती है।
* पूजा का लम्बा शुभ काल:
पूजा के लिए अच्छा समय सुबह 07:13 बजे से दोपहर 12:33 बजे तक भी बताया गया है — यह लगभग 5 घंटे 20 मिनट का शुभ काल है।
महत्वपूर्ण बातें
* बसंत पंचमी की तिथि आज 02:28 बजे से प्रारंभ हुई और कल (24 जनवरी) 01:46 बजे तक रहेगी।
* इस दिन बुद्धि, विद्या, कला, संगीत और शिक्षा की देवी माँ सरस्वती की पूजा में यह समय विशेष रूप से फलदायी माना जाता है।
* सुबह के समय पूजा करने से ज्ञान, स्मरण शक्ति और रचनात्मकता में वृद्धि की इच्छा के साथ आरंभ करना शुभ माना जाता है।
बसंत पंचमी का धार्मिक और पौराणिक महत्व
हिंदू धर्मग्रंथों के अनुसार, बसंत पंचमी के दिन माँ सरस्वती का प्राकट्य हुआ था। माँ सरस्वती को विद्या, वाणी, विवेक, संगीत और रचनात्मकता की देवी माना जाता है। इस दिन पीले वस्त्र धारण कर, पीले फूल अर्पित कर और पीले मिष्ठान का भोग लगाकर देवी की पूजा की जाती है।
मान्यता है कि बसंत पंचमी के दिन पूजा-अर्चना करने से अज्ञान का नाश होता है और ज्ञान का प्रकाश बढ़ता है। विशेष रूप से विद्यार्थी इस दिन पुस्तकों, लेखनी और वाद्य यंत्रों की पूजा कर शिक्षा के क्षेत्र में सफलता की कामना करते हैं।
बसंत ऋतु और प्रकृति का सौंदर्य:
बसंत पंचमी के साथ ही प्रकृति में अद्भुत परिवर्तन देखने को मिलता है। खेतों में सरसों की पीली फसलें, पेड़ों पर नई कोपलें और फूलों की बहार चारों ओर उल्लास का वातावरण बना देती है। मौसम में हल्की गर्माहट और सुहावनापन मन को प्रसन्न कर देता है। पीला रंग इस पर्व का मुख्य प्रतीक है, जो ऊर्जा, आशा, समृद्धि और सकारात्मकता को दर्शाता है। यही कारण है कि लोग इस दिन पीले वस्त्र पहनते हैं और पीले रंग के व्यंजन बनाते हैं।
शिक्षा और सांस्कृतिक परंपराएँ
बसंत पंचमी का शिक्षा जगत से गहरा संबंध है। कई स्थानों पर इस दिन विद्यारंभ संस्कार किया जाता है, जिसमें छोटे बच्चों को पहली बार अक्षर ज्ञान कराया जाता है। स्कूलों, कॉलेजों और शिक्षण संस्थानों में विशेष पूजा, सांस्कृतिक कार्यक्रम और सरस्वती वंदना का आयोजन किया जाता है। संगीत, नृत्य और साहित्य से जुड़े कलाकार इस दिन को अपने लिए अत्यंत शुभ मानते हैं। कवि सम्मेलन, संगीत सभाएँ और सांस्कृतिक कार्यक्रम बसंत पंचमी की शोभा को और बढ़ा देते हैं।
कृषि और सामाजिक महत्व
किसानों के लिए बसंत पंचमी का विशेष महत्व है क्योंकि इस समय रबी की फसलें पकने की अवस्था में होती हैं। सरसों और गेहूं की फसलें खेतों में लहलहाती हैं, जो आने वाली अच्छी पैदावार का संकेत देती हैं। सामाजिक रूप से यह पर्व लोगों को नई शुरुआत, सौहार्द और उत्साह का संदेश देता है। कई स्थानों पर इस दिन विवाह, गृह प्रवेश और अन्य शुभ कार्य भी किए जाते हैं।
बसंत पंचमी और आधुनिक समाज
आज के आधुनिक युग में भी बसंत पंचमी का महत्व कम नहीं हुआ है। डिजिटल युग में शिक्षा, नवाचार और रचनात्मकता को बढ़ावा देने के लिए यह पर्व प्रेरणा का स्रोत बन रहा है। युवा वर्ग इस दिन को नई योजनाओं, नए संकल्पों और आत्म-विकास के अवसर के रूप में देखता है। सोशल मीडिया पर भी बसंत पंचमी की शुभकामनाएँ, सरस्वती वंदना और सांस्कृतिक संदेश साझा किए जा रहे हैं, जिससे यह पर्व वैश्विक स्तर पर भी पहचान बना रहा है।
पूजा विधि और परंपराएँ
बसंत पंचमी के दिन प्रातः स्नान कर स्वच्छ पीले वस्त्र धारण किए जाते हैं। माँ सरस्वती की प्रतिमा या चित्र के समक्ष पूजा कर पुष्प, अक्षत, पीले फल और मिष्ठान अर्पित किए जाते हैं। विद्यार्थियों द्वारा किताबों और कलम की पूजा विशेष रूप से की जाती है। इस दिन सात्त्विक भोजन करना और सकारात्मक विचार रखना शुभ माना जाता है।
बसंत पंचमी केवल एक धार्मिक पर्व नहीं, बल्कि ज्ञान, संस्कृति, प्रकृति और जीवन में नवचेतना का उत्सव है। यह दिन हमें अज्ञान से ज्ञान की ओर, निराशा से आशा की ओर और ठहराव से प्रगति की ओर बढ़ने की प्रेरणा देता है। 23 जनवरी को मनाई जा रही बसंत पंचमी हर व्यक्ति के जीवन में नई ऊर्जा, रचनात्मकता और सकारात्मक परिवर्तन लेकर आए—यही इस पर्व का सच्चा संदेश है। माँ सरस्वती की कृपा से समाज में शिक्षा, सद्भाव और संस्कृति निरंतर विकसित होती रहे, यही कामना है।
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